नई दिल्ली। ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन (जेईई) में सफलता के झंडे गाडऩे वाले राजस्थान निवासी कल्पित वीरवाल को लेकर देशभर में चर्चाएं हो रही है। चर्चा उनके अंकों के साथ उनकी कैटेगरी को लेकर भी हो रही है। कल्पित दलित समुदाय से आते हैं। लेकिन उनकी सफलता ने इन मायनों को कौसों दूर छोड़ दिया। कल्पित ने बताया कि नियमित पढ़ाई और आत्मविश्वास के चलते उन्हें जेईई मैंस में यह सफलता मिली। अब उनका ध्यान अगले माह होने वाली जी-अडवांस पर है। कल्पित ने कहा कि मेरे परिवार में माहौल पूरी तरह सामान्य है। दलित होने के नाते पढ़ाई के मामले में किसी प्रकार की समस्या नहीं आई। वैसे भी अब समय बदल रहा है। पहले जहां देश की आईआईटी और सिविल सेवाओं में सवर्णों का दबदबा रहता था। आज इसमें काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। युवा अब अपने करियर पर ध्यान देते हुए गहनता से पढ़ रहे हैं। वर्ष 2015 में आईएएस परीक्षा में टॉपर टीना डाबी दलित समुदाय से रही। वहीं महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की परीक्षा में टॉप करने वाला भूषण अहीर दलित समुदाय से थे। कल्पित ने बताया कि नियमित रुप से 5 से 6 घंटे पढ़ाई के जरिए ही सफलता मिली। अब आईआईटी बॉम्बे में कम्प्यूटर साइंस में दाखिला लेना है। इसके बाद ही निर्णय किया जाएगा कि क्या करना है। कल्पित ने कहा कि इंजीनियरिंग पूरी होने के बाद ही सिविल सेवाओं के बारे में विचार करुंगा। बता दें कल्पित के पिता पुष्कर लाल वीरवाल उदयपुर के महाराणा भूपाल सिंह सरकारी अस्पताल में कम्पाउंडर है तो मां पुष्पा देवी सरकारी स्कूल में शिक्षक। प्रमुख दलित चितंक कांचा इलैया ने कहा कि शिक्षा की बदौलत अब समय बदल रहा है। ओबीसी और दलित समुदाय के छात्र भारी पडऩे वाले हैं। अब वो समय दूर नहीं जब किसी दलित को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।

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