-बाल मुकुन्द ओझा
देश और दुनिया में नकली और घटिया दवाओं का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। यह दवाइयां इंटरनेट के जरिए, काउंटर से या फिर गैर-कानूनी तरीके से बेची जाती हैं। आम तौर पर ये दवाइयां कोई असर नहीं करतीं लेकिन कई बार घातक होती हैं और जान भी ले सकती है। देश के विभिन्न राज्यों में हाल ही में नकली दवाइयों की बड़ी खेप पकड़ी गई। जयपुर में हाल ही 37 लाख रुपए से अधिक की नकली दवाएं जब्त कीं गई। ये नकली दवाएं जयपुर के अलावा पूरे राजस्थान में भेजी जा रही हैं। इन सभी जगहों से एट्रोवेसटाटीन टेबलेट, रेमीप्रील, ल्यूपिन फार्मा, यूरिमेक्स डी टेबलेट, सिपला, डुफास्टोन, अबोट की दवाएं संदेहास्पद पाई गई हैं। देश में नकली और घटिया दवाओं की बाढ़ आ गई है। आये दिन देश के विभिन्न भागों में घटिया और अमानक दवाऐं पकड़ी जा रही है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत सहित विभिन्न देशों में नकली दवाओं का कारोबार लगभग तीस अरब डॉलर तक पहुंच गया है। कोरोना काल में घटिया और नकली दवाओं के साथ अन्य सम्बद्ध उत्पाद धडल्ले से बिक रहे है जिसकी वजह से त्वचा की विभिन्न बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं। दवाइयों का क्षेत्र एक ऐसा क्षेत्र हैं जहां असली व गुणवत्ता की पहचान करना बेहद कठिन होता है। चूंकि दवाओं का एक्शन-रिएक्शन खाने या प्रयोग करने के बाद पता चलता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत नकली दवाओं का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार है। भारत में 25 फीसदी के करीब दवाइयां नकली है। हमारे देश में अंग्रेजी दवाइयों ने घर घर में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। जिसे देखो अंग्रेजी दवाइयों के पीछे भागता मिलेगा। सामान्य बीमारियों से लेकर असाध्य बीमारियों की दवा आज घरों में मिल जाएगी। इनमें चिकित्सकों द्वारा लिखी दवाइयों के अलावा वे दवाइयां भी शामिल है जो मेडिकल स्टोर्स से बीमारी बताकर खरीदी गई है अथवा गूगल से खोजकर निकाली गई है। ये दवाइयां असली है या घटिया अथवा नकली ये भी आम लोगों को मालूम नहीं है। घटिया दवाइयों का बाजार आजकल खूब फलफूल रहा है। आये दिन घटिया और नकली दवाइयां बरामद करने की खबरें मीडिया में सुर्खियों में पढ़ने को मिल रही
है। इन दवाइयों के सेवन से साधारण खांसी बुखार और जुखाम को ठीक होने में एक पखवाड़ा या महीना लग जाता है। इसके बावजूद ऐसी दवाइयां खरीदने में हमें कोई हिचकिचाहट नहीं हो रही है। लोग सामान्य बीमारियों में अस्पतालों में लम्बी लाइनों में धक्का खाने की अपेक्षा दूकानों से दवा खरीद लेते है। अनेक बार बड़े मुनाफे के चक्कर में दुकानदार घटिया दवाएं लोगों को थमा देते है जो आगे जाकर स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित होती है। पढ़े लिखे लोगों को भी बिना डॉक्टर को दिखाएं ऐसी दवाएं खरीदते देखा जा सकता है। सरकारी दुकानों पर मिलीभगत से ब्रांडेड दवा के नाम से नकली दवा बेचने का खेल भी चल रहा है। अंग्रेजी दवाओं के इस जंजाल से निकलना आम लोगों के लिए भारी मुश्किल हो रहा है। अंग्रेजी दवाओं के  इस चक्रव्यूह में फंसना तो आसान है मगर निकलना दूभर। एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में लगभग 200 बिलियन डालर का घटिया और नकली दवाओं एवं वैक्सीन का धंधा है। एशिया में बिकने वाली 30 प्रतिशत दवाएँ नकली या घटिया हैं। भारत में बिकने वाली हर पाँच  गोलियों के पत्तों में में से एक नकली है। इन दवाइयों से हर वर्ष लगभग 5 प्रतिशत धनहानि देश को होती है और ये धंधा बेरोकटोक चल रहा है और असली दवाइयों के व्यापार से भी ज्यादा तरक्की कर रहा है। दवा एक केमिकल होता है। रसायन होता है। दवा कंपनियां अपने मुनाफा एवं विपरण में सहुलियत के लिए इन रसायनों को अलग से अपना ब्रांड नाम देती है। जैसे पारासेटामल एक साल्ट अथवा रसायन का नाम है लेकिन कंपनिया इसे अपने हिसाब से ब्रांड का नाम देती हैं और फिर उसकी मार्केंटिंग करती है। ब्रांड का नाम
ए हो अथवा बी अगर उसमें पारासेटामल साल्ट है तो इसका मतलब यह है कि दवा पारासेटामल ही है।

LEAVE A REPLY