पीएचईडी: 32000 करोड़ की पेयजल योजनाओं में खपाए घटिया क्वालिटी के पाइप

-जीतेन्द्र शर्मा
जयपुर। जलदाय विभाग में 32 हजार करोड़ की पेयजल योजनाओं में हजारों करोड़ के घटिया पाइपों को खपा दिया गया। लंबे समय से ठेका कंपनियों और इंजीनियर्स की मिलीभगत से चल रहे इस खेल ने विभाग की सभी पेयजल योजनाओं को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। विभाग की पेयजल योजनाओं में न केवल जैन ईरिगेशन, मिराज, आर्मप्लास्ट, तिरूपति, एक्वाकेयर, खेतान और इनोेवाप्लास्ट जैसी यूपीवीसी और एचडीपीई कंपनियों के पाइप फेल हुए हैं, बल्कि देश की टाटा डक्ट्रा, जिंदल शॉ और इलेक्ट्रोथर्म जैसी नामी डीआई कंपनियों पाइप भी फेल हो गए।

जलदाय विभाग के इंजीनियर्स ने इन घटिया पाइपों को ठेका और पाइप कंपनियों से मिलीभगत कर उन्हें पेयजल योजनाओं में लगा दिया। मजेदार बात तो यह है कि विभाग में डीआई, एचडीपीई और यूपीवीसी पाइप फेल होने के बाद भी इंजीनियर्स ठेका और पाइप कंपनियों को सही ठहराने में जुटे हुए हैं। दरअसल जलदाय विभाग में घटिया पाइपों को खपाने का खेल तो लंबे समय से चल रहा है, लेकिन 2014 में घटिया पाइपों की शिकायत मिलने के बाद तत्कालीन जलदाय मंत्री किरण माहेश्वरी ने विभाग में विजिलेंस एवं क्वालिटी कंट्रोल टीम का गठन किया। वर्ष 2015 में क्वालिटी कंट्रोल टीमों ने विभागीय पेयजल योजनाओं में काम में लिए जा रहे डीआई, एचडीपीई और यूपीवीसी पाइपों के सैंपल उठाकर उनकी केन्द्र सरकार की सैंट्रल इंस्टीट्यूट आॅफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नोलॉजी लैब सीतापुरा में जांच कराई तो विजिलेंस टीम और विभाग के अधिकारी सकते में आ गए। लैब की जांच में यूपीवीसी पाइपों के 70 प्रतिशत सैंपल फेल हो गए। एचडीपीई और डीआई पाइप कंपनियों के कई सैंपल भी जांच में फेल हो गए। वर्ष 2015 में क्वालिटी कंट्रोल विंग की ओर से प्रदेश के 33 जिलों में चल रही पेयजल योजनाओं में से 9 जिलों की योजनाओं में चल रहे कार्यों में से 256 योजनाओं से पाइपों के सैंपल लिए गए। क्वालिटी कंट्रोल विंग को प्रथम चरण में 224 पाइप सैंपलों की रिपोर्ट प्राप्त हुई, जिसे देखकर क्वालिटी कंट्रोल विंग के अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। जांच रिपोर्ट में डीआई, एचडीपीई और यूपीवीसी पाइपों के 37 सैंपल पूरी तरह से फेल पाए गए। विभाग को बदनामी से बचाने और अधिकारी-इंजीनियर्स ने खुद की लापरवाही को छुपाने के लिए पूरे मामले को दबा दिया। जांच में जिंदल शॉ, टाटा डक्ट्रा और इलेक्ट्रोथर्म कंपनियों के डीआई पाइप फेल होने के बाद ठेका कंपनियों ने पाइप कंपनियों और इंजीनियर्स के साथ मिलकर मामले को दबाने का पूरा प्रयास किया, लेकिन निवाई-बीसलपुर पेयजल परियोजना में जिंदल शॉ कंपनी के घटिया पाइपों ने विभाग के अधिकारियों और ठेका कंपनियों के मनसूबों पर पानी फेर दिया। निवाई-बीसलपुर पेयजल पाइपलाइन के पाइप सेक्शनल टेस्टिंग के दौरान चार जगह से फट गए।

प्रोजेक्ट का काम देख रही मैसर्स एसपीएमएल कंपनी की ओर प्रोजेक्ट में बिछाए जा रहे जिंदल शॉ कंपनी के इन डीआई पाइपों की विभाग द्वारा एमएनआईटी जयपुर में जांच करवाई गई तो सारे पाइप टेस्टिंग में फेल हो गए। मीडिया में खबरें आने और विधानसभा में विपक्ष द्वारा मामले को लेकर जलदाय मंत्री को घेरने के बाद विभाग ने मैसर्स के बाद प्रोजेक्ट का काम कर रही मैसर्स एसपीएमएल कंपनी और पाइप कंपनी मैसर्स जिंदल शॉ को ब्लैकलिस्ट करने का नोटिस जारी किया था, लेकिन कंपनी की ओर से पेयजल योजना के पाइप बदलने का आश्वासन देने के बाद मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई। सूत्रों के अनुसार निवाई-बीसलपुर परियोजना में डीआई पाइप फेल होने के मामले को दबाने के लिए मैसर्स एसपीएमएल कंपनी और मैसर्स जिंदल शॉ पाइप कंपनी को करोड़ों रूपए खर्च करने पड़े थे तब जाकर पूरा मामला फाइलों में दबा था। इतना ही विभाग में बड़ी संख्या में एचडीपीई और यूपीवीसी पाइप भी टेस्टिंग में फेल हो गए थे, लेकिन इंजीनियर्स और ठेका कंपनियों की मिलीभगत से इन पाइपों को पेयजल योजनाओं में खपा दिया गया।

-जिंदल शॉ, टाटा और इलेक्ट्रोथर्म डीआई कंपनियों के पाइप हुए फेल
जलदाय विभाग की पेयजल योजनाओं में लगाए जा रहे कई डीआई पाइप भी फेल हो गए। इनमें देश की नामी मैसर्स जिंदल शॉ, मैसर्स टाटा डक्ट्रा और मैसर्स इलेक्ट्रोथर्म जैसी कंपनियों के डीआई पाइप शामिल है। मैसर्स जिंदल शॉ कंपनी के डीआई पाइप निवाई-बीसलपुर पेयजल प्रोजेक्ट और ब्यावर-जवाजा पेयजल प्रोजेक्ट में फेल हो चुके हैं। इसी प्रकार मैसर्स टाटा डक्ट्रा कंपनी के डीआई पाइप बीसलपुर-सांभर पेयजल प्रोजेक्ट, भरतपुर-डीग पेयजल प्रोजेक्ट और किशनगढ़ पेयजल प्रोजेक्ट में फेल हो चुके हैं। मैसर्स इलेक्ट्रोथर्म कंपनी के डीआई पाइप बूंदी वाटर सप्लाई प्रोजेक्ट और भवानीमंडी पिपलाद पेयजल प्रोजेक्ट में फेल हो चुके हैं।

-हर 7वां पाइप टेस्टिंग में फेल
जलदाय विभाग की 32 हजार करोड़ से ज्यादा की पेयजल योजनाओं में जमकर घटिया पाइपों को खपाया गया है। इंजीनियर्स और ठेका कंपनियों की मिलीभगत से चल रहे इस खेल में अब तक हजारों करोड़ के घटिया पाइप योजनाओं में लग चुके हैं। विभाग की पेयजल योजनाओं में लगाया जा रहा हर 7वां पाइप क्वालिटी टेस्ट में फेल हो गया, लेकिन फिर भी मिलीभगत से इन पाइपों को पेयजल योजनाओं में लगा दिया गया। विभाग की क्वालिटी कंट्रोल विंग ने वर्ष 2015 में 224 पाइप सैंपलों की जांच कराई, जिसमें 37 योजनाओं के पाइप क्वालिटी टेस्ट में फेल हो गए।

-पाइप फेल होने लगे तो कम कर दिए सैंपल
जलदाय विभाग में पेयजल योजनाओं में पाइपों के फेल होने का आंकड़ा बढ़ने लगा तो फील्ड इंजीनियर्स, क्वालिटी कंट्रोल विंग, ठेका कंपनियोें और पाइप कंपनियों का गठजोड़ बना गया। इस गठजोड़ के बाद क्वालिटी कंट्रोल विंग ने पेयजल योजनाओं में पाइपों के सैंपल लेना ही कम कर दिया। विंग द्वारा उन पेयजल योजनाओं के पाइपों के सैंपल ही लिए जा रहे हैं, जो या तो आकर मिली नहीं या फिर वहां की शिकायत मिली हो। वर्ष 2015 में क्वालिटी कंट्रोल विंग ने पेयजल योजनाओं से 250 से ज्यादा पाइप सैंपल लिए थे, ये आंकड़ा वर्ष 2016 में में 200 से भी कम हो गया। वर्ष 2017 में यह आंकड़ा 150 से भी कम हो गया और चालू वर्ष में तो अभी तक 50 पाइपों के सैंपल भी नहीं टेस्ट किए गए। जबकि टेंडर शर्तों के अनुसार पाइप टेस्टिंग का सारा खर्चा संबंधित ठेका कंपनी द्वारा उठाया जाता है, लेकिन फिर भी विभाग की क्वालिटी कंट्रोल टीम सैंपल उठाने से बचते रहते हैं। कम सैंपल उठाने के पीछे क्वालिटी कंट्रोल विंग के अधिकारियों द्वारा संसाधनों का अभाव और मैन पावर की कमीं का बहाना बनाकर खुद को सेफ जोन में डालकर बैठे हैं।

-80 % पेयजल योजनाओं के पाइप की जांच ही नहीं की
जलदाय विभाग में कई जिलों की पेयजल योजनाएं तो ऐसी हैं, जिनमें लग रहे पाइपों की कभी जांच ही नहीं हुई। पेयजल योजनाओं में लगाए जा रहे पाइपों की जांच को लेकर न तो कभी संबंधित इंजीनियर्स ने क्वालिटी कंट्रोल को पत्र लिखा और न ही कभी क्वालिटी कंट्रोल विंग ने इन योजनाओं के पाइपों की जांच करने की जहमत उठाई। इसी का नतीजा है कि प्रदेश के कई जिलों की पेयजल योजनाओं के कार्य की दरें टेंडर कॉस्ट से 20 से 50 प्रतिशत कम आ रही है, और फिर भी फर्मों द्वारा योजनाओं का काम पूरा किया जा रहा है। इतनी कम दरों पर काम करने, जीएसटी और 10 से 17 प्रतिशत तक कमीशन बांटने के बाद भी ठेकेदार योजनाओं से बचत कमा रहे हैं, तो फिर अंदाजा लगाया जा सकता है कि योजनाओं में क्या चल रहा है। विभाग की सभी योजनाओं में बी और सी केटेगरी के डीआई, एचडीपीई और यूपीवीसी पाइपों का इस्तेमाल किया जा रहा है। विश्वसनीय सूत्रों की माने तो ठेका कंपनियों द्वारा बिलो रेट पर टेंडर हासिल किए जाते हैं और फिर पाइप कंपनियों से मिलकर कम रेट के हल्की क्वालिटी के पाइप तैयार करवाकर योजनाओं में लगाए जाते हैं। जलदाय विभाग के इंजीनियर्स को इस सारे खेल का पता है, लेकिन कमीशन के लालच में वे इन सबकी अनदेखी कर क्वालिटी के साथ समझौता कर रहे हैं।

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