जयपुर। सूर्य पर आधारित मकर संक्रांति के पर्व का हिंदू धर्म मेंं अपना एक अलग ही महत्व है। हिंदू संस्कृति में इस पर्व के महत्व व पवित्रता को उसी प्रकार समझा जा सकता है, जैसे पर्वतों में हिमालय पर्वत, वृक्षों में पीपल व हाथियों में ऐरावत। वेद पुराणों में भी इस दिन का विशेष उल्लेख मिलता है। हिंदू धर्म में महिने को दो भागों में विभक्त कर रखा है शुक्ल पक्ष व कृष्ण पक्ष। इसी तरह वर्ष को भी दो भागों में बांट रखा है। एक उत्तरायण व दूसरा दक्षिणायन। इन दो अयनों से मिलकर ही एक वर्ष पूरा होता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए अपनी दिशा बदलकर थोड़ा उत्तर की ओर ढलता है, इसे ही उत्तरायण कहा जाता है। इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। इस राशि परिर्वतन के समय को ही मकर संक्रांति कहा जाता है। मकर संक्रांति ही एक ऐसा पर्व है। जिसे समूचे भारतवर्ष में एक साथ मनाया जाता है। यद्दपि इसको मनाने का तरीका व नाम देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग है, फिर भी इस पर्व का अपना ही एक अलग महत्व है।
होली, दीपावली, महाशिवरात्रि सरीखे त्यौंहार पौराणिक कथाओं पर आधारित है, लेकिेन मकर संक्रांति एक खगोलिय घटना है। जिससे जड़ व चेतन की दशा व दिशा तय होती है। इस दिन से हमारी धरती एक नए वर्ष में व सूर्य एक नई गति से प्रवेश करता है। वैज्ञानिकों के अनुसार २१ मार्च को धरती सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लेती है। इसी २१ मार्च के आस-पास ही विक्रम संवंत की शुरुआत होने के साथ हिंदू संस्कृति के अनुसार नए वर्ष का प्रारंभ होता है। लेकिन मकर संक्रांति यानी १४ जनवरी से से धरती पर एक अच्छे दिन की शुरुआत होती है। ऐसा इसलिए कि अब सूर्य दक्षिण के बजाय उत्तर की तरफ गमन करता है। जब सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर गमन करता है तो उसकी किरणों का असर खराब माना जाता है। लेकिन जब सूर्य पूर्व से उत्तर की ओर गमन करता है तो उसकी किरणों को सेहत के लिए स्वास्थ्य प्रद व जीवन में शांतिदायक मानी जाती है।
धरती पर उतरी थी गंगा
मकर संक्रांति के दिन ही गंगा नदी का धरती पर अवतर हुआ। महाभारत में भी पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया। इसके पीछे कारण यह भी माना जाता है कि उत्तरायण में देह छोडऩे वाली आत्माएं या कुछ काल के लिए देवलोक में चली जाती है या फिर पुर्नजन्म के चक्र से उन्हें छुटकारा मिल जाता है। दक्षिणायन में देह छोडऩे पर आत्मा को कई काल तक अंधकार का सामना करना पड़ता है। भगवा श्रीकृष्ण ने उत्तरायण का महत्व बताते हुए गीता में कहा कि उत्तरायण के छह माह के शुभ काल में जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय होती है। इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने पर व्यक्ति पुर्नजन्म के चक्र से मुक्त होता है व ब्रह्म की प्राप्ति होती है। जबकि दक्षिणायन की स्थिति में शरीर का त्याग करने पर भी उसे पुर्नजन्म लेना ही पड़ता है। सब कुछ प्रकृति बद्ध है। पौधा भी प्रकार में बढ़ता है तो अंधकार में वह सिकुड़ जाता है। इसलिए मुत्यु हो तो प्रकाश में हो ताकि यह पता लग सके की हमारी गति और स्थिति क्या है? क्या इसमें सुधार किया जा सकता है और उपर्युक्त चयन का मौका है?
तिल का बड़ा महत्व
संक्रांति के दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मकर राशि के स्वामी शनि देव है। जो सूर्य के पुत्र होने के बाद भी उनसे शुत्र का भाव रखते हैं। इसलिए शनिदेव के घर में सूर्य की उपस्थिति के दौरान शनि उन्हें कष्ट न दे, इसलिए इस दिन तिल का दान किया जाता है। वहीं तिल में कार्बोहाइडे्रट, कैल्सियम व फास्फोरस पाया है। इसमें विटामिन बी व सी भी भरपूर होता है। जो पाचक, स्वादिष्ट, पौष्टिक व स्वास्थ्य रक्षक होता है। वहीं गुड़ में कैल्सियम, आयरन विटामिनस सहित अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ होते हैं। गुड़ खाने से हृदय मजबूत होता है और कोलेस्ट्राल घटता है। तिल व गुड़ मिलाकर खाने से सर्दी का असर भी कम होता है। ऐसे में सर्दी के दिनों मे विशेषकर इस दिन तिल गुड़ का उपयोग करने से लाभ ही प्रदान होता है।
दान का भी महत्व
मकर संक्रांति के दिन दान का अपना बड़ा महत्व है। इस दिन ब्राह्मणों को दान में अनाज, वस्त्र ऊनी कपड़े, फल आदि दान करने से व्यक्ति को शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। कहा भी जाता है कि इस दिन किया गया दान सौ गुना होकर प्राप्त होता है। मकर संक्रांति के दिन दान करने से व्यक्ति सभी भोगों को भोगकर मोक्ष को प्राप्त करता है। वहीं देश के अनेक हिस्सों विशेषकर राजस्थान व गुजरात में इस दिन पतंगबाजी जमकर होती है। भौर होने से पहले ही पतंगबाजी के शौकिन छतों पर जा चढ़ते हैं और सूरज ढलने तक पतंगों के पेच लड़ाकर पर्व की खुशियां बिखरेने में लगे रहते हैं।

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