-राकेश कुमार शर्मा

जयपुर। भावी पीढ़ी के शैक्षणिक विकास की तैयारी में लगे राजस्थान के सरकारी विश्वविद्यालयों और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजनीति के अखाड़े बने हुए हैं। जिन विश्वविद्यालयों में पढ़ाई, शोध, रोजगार, आविष्कार पर जोर दिया जाना चाहिए, वहां कुछ सालों से विचारधारा थोपने की पौध तैयारी की जा रही है। हर सरकार इस कार्य में लगी है, चाहे वह कांग्रेस या भाजपा हो या अन्य कोई दल। जो भी दल सत्ता में आता है, वह उच्च शिक्षण संस्थानों में अपनी विचाराधारा आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक दखलंदाजी में लग जाता है, चाहे वह कुलपति व दूसरे महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति का मामला हो या शिक्षण सामग्री में बदलाव। धीरे-धीरे विचारधारा की यह लड़ाई शिक्षकों और छात्रों में पहुंच रही है। विश्वविद्यालयों व उच्च शिक्षणों में विचारधारा के आधार पर शिक्षकों व छात्रों में बंटवारा देखा जा सकता है। हालांकि पहले से ही राजनीतिक दलों के अलग-अलग छात्र संगठन सक्रिय रहे हैं, लेकिन ये छात्रसंघ चुनाव व छात्र हितों तक सीमित रहते थे। जैसे-जैसे सरकारों की दखलंदाजी बढ़ती जा रही है, वैसे ही छात्र संगठन भी उतने ही उत्तेजित तरीके से आमने-सामने होने लगे हैं। दिल्ली में जेएनयू विवाद सबके सामने है। कश्मीर की आजादी और राष्टय सुरक्षा के मुद्दे पर हुए इस विवाद में पहले छात्र संगठन आमने-सामने हुए। फिर इस मसले पर लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के आला नेता भी कूद पड़े और बयानबाजी का ऐसा दौर चला कि देश में एक अलग ही तरह का माहौल खड़ा हो गया। कई दिनों तक पढ़ाई ठप रही। जेएनयू पुलिस छावनी बना रहा। कोर्ट और जेएनयू परिसर में झगड़े तक हो गए। यह विवाद दिल्ली सीमा से बढ़कर दूसरे राज्यों तक फैल गया। पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश , राजस्थान में भी छात्र संगठन आमने-सामने हो गए। राजनीतिक दलों की उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़ती दखलंदाजी का ही नतीजा है कि इस तरह की घटनाएं आम हो गई है। किसी भी मुद्दे पर कब छात्र आमने-सामने हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता है। कुछ दिनों पहले स्कूली पाठ्यक्रम में प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरु से जुड़े पाठ्यक्रमों को हटाने समेत अन्य बदलाव करने को लेकर राजस्थान में बड़ा विवाद हो चुका है। पूरे प्रदेश में बड़े स्तर पर विरोध-प्रदर्शन हुए। एनएसयूआई के साथ कांग्रेस भी इस मुद्दे पर सड़कों पर उतर आई। राजस्थान विश्वविद्यालय में एनएसयूआई व विधार्थी परिषद के छात्रों में झगड़े तक हुए। इससे पहले जेएनयू विवाद में तो लाठी-भाटा जंग और पुलिस से झड़पें हुई। पाठ्यक्रम में बदलाव का मसला मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री के इस बयान के बाद शांत हुआ कि जवाहर लाल नेहरु से जुड़े पाठ्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया गया है। अब नया विवाद विश्वविद्यालयों में कुलपति चयन को लेकर चल रहा है। आरोप लग रहे हैं कि एक विचारधारा और संगठन से जुड़े व्यक्तियों को कुलपति बनाया गया है। कुलपति चयन में नियम-कायदों का ध्यान नहीं रखा गया है। चयन में निष्पक्षता और पारदर्शिता नहीं बरती गई। सबसे ज्यादा सवाल राजस्थान विश्वविद्यालय में नियुक्त कुलपति जे.पी.सिंघल, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.डॉ. आर.पी.सिंह और जगदगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में प्रो.विनोद शास्त्री को कुलपति बनाए जाने पर खासा विवाद छाया रहा। सिंघल पर आरोप है कि वह पीएचडी ही नहीं है और ना ही उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ाने का अनुभव है। एक संगठन की शैक्षिक इकाई के दायित्व को देखते थे सिंघल। प्रो.सिंह विवादित रहे हैं और कई आरोप लग चुके हैं। इसे लेकर जोधपुर में काफी धरने-प्रदर्शन भी होते रहे हैं। ऐसे ही प्रो.विनोद शास्त्री के चयन पर भी सवाल उठते रहते हैं। इसी तरह जोबनेर, बीकानेर, जोधपुर के कृषि व दूसरे सरकारी विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति भी विवाद रहा।
कांग्रेस व इससे जुड़े शिक्षक संगठनों का आरोप है कि कुलपति चयन में राजनीतिक दखलंदाजी हावी रही है। शिक्षाविद के बजाय सरकार और उससे जुड़े संगठनों में कार्य करने वाले पदाधिकारियों को कुलपति बनाया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्टÓीय अध्यक्ष कैलाश शर्मा को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का कुलपति बनाकर और राजस्थान विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के हेड रहे नंद किशोर पाण्डेय को केन्द्रीय हिन्दी आयोग का अध्यक्ष बनाया है। ये दोनों भाजपा की छात्र इकाई के पदाधिकारी रहे हैं।
उधर, भाजपा व उससे जुड़े शिक्षक संगठन के पदाधिकारी इन आरोपों को खारिज करते हैं। इनका कहना है कि कुलपति चयन में पूरे नियम-कायदों का ध्यान रखा है। कांग्रेस राज में कुलपति चयन में भाई-भतीजावाद हावी रहा और गलत लोगों को नियुक्ति दी गई, जिसके चलते शिक्षा का माहौल बिगड़ा और व्यवस्थाएं गड़बड़ाई। राजस्थान विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर का कहना था कि कुछ लोगों को उपकृत करने के लिए पत्रकारिता और विधि विश्वविद्यालय खोल दिए गए, जबकि इसकी जरुरत ही नहीं थी। रिश्तेदारों को कुलपति बना दिया, जिनकी पास पूरी योग्यता तक नहीं थी।
– कांग्रेस राज में भी भाई-भतीजावाद
कांग्रेस राज में भी सरकारी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में उच्च पदों पर नियुक्ति में राजनीतिक दखलंदाजी कम नहीं रही है। राजस्थान विश्वविद्यालय, उदयपुर, जोधपुर के विश्वविद्यालयों के साथ बीकानेर कृषि विश्वविद्यालय में कुलपति चयन में भाई-भतीजावाद और योग्यता दरकिनार करने के आरोप लगे। राजस्थान विश्वविद्यालय में नियुक्त कुलपति देवस्वरुप के बारे में कहा जाता है कि वे यूपीए राज में बड़े संवैधानिक पद पर रही एक महिला नेत्री के नजदीक रिश्तेदार हैं। उन्हीं की कृपा से अशोक गहलोत के दूसरे कार्यकाल में कुलपति पद पर चयन किया गया। हालांकि इनका कार्यकाल काफी हंगामेदार रहा। विरोधी का कहना है कि इनके अक्खड स्वभाव और प्रशासनिक कार्यकुशलता में कमी के चलते राजस्थान विश्वविद्यालय परिसर राजनीतिक दंगल का अखाड़ा बना रहा। सरकार का छात्र संगठन भी इनके खिलाफ आंदोलन करता रहा। इसी तरह को कांग्रेस की एक बड़ी नेत्री, जो बड़े संवैधानिक पद पर रही के नजदीक रिश्तेदार बताया गया है। गहलोत सरकार में ही बीकानेर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर के विश्वविद्यालयों में कुलपति चयन पर विवाद रहे। बीकानेर कृषि विश्वविद्यालय में नियुक्त डॉ. ए.के.गहलोत पर कांग्रेस के एक बड़े नेता की रिश्तेदारी के आरोप लगे। इनके कार्यकाल में वित्तीय अनियमितताओं और नियुक्तियों में धांधलियों के मामले भी उठे और कुछ मामले पुलिस और कोर्ट-कचहरी तक पहुंचे। अभी भी एसीबी व पुलिस में मामलों की जांच चल रही है। कोटा खुला विश्वविद्यालय में प्रो.नरेश दाधीच को कुलपति बनाया, जो कांग्रेस के एक प्रकोष्ठ के पदाधिकारी भी बताए जाते थे। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय में कुलपति डॉ. विमलेश चौधरी के परिवार की पृष्ठभूमि भी कांग्रेस विचारधारा की बताई जाती है। वे अभी भी कुलपति है। सरकार का प्रमुख संगठन इन्हें हटाने का दबाव बनाए हुए हैं, लेकिन क्षेत्र विशेष की राजनीति और दबाव के चलते सरकार फैसला ले नहीं पा रही है।
– माध्यमकि शिक्षा बोर्ड में भी दखलंदाजी
सरकारी विश्वविद्यालयों के साथ माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, कॉलेज निदेशालय और आरपीएससी भी राजनीतिक दखंलदाजी का अड्डा बनने लगा है। हर सरकार अपने समर्थक व विचारधारा के लोगों को नियुक्त करके उपकृत करने लगी है। इस वजह से आयोग व बोर्डों का राजनीतिकरण होने लगा है और जिन उद्देश्यों को लेकर इनका गठन हुआ है, उस पर ठीक से काम नहीं हो पा रहा है। उपकृत होने वाले आयोग अध्यक्ष सिर्फ सरकार व पार्टी के मुताबिक ही चलते हैं और उनके अनुसार कार्य को अंजाम देते हैं। चाहे फिर नियुक्तियों हो या पाठ्यक्रम से संबंधित मसले, उनमें विचारधारा हावी होती है। योग्यता और पारदर्शिता ताक में रख दी जाती है। एक गुट अपनी विचारधारा को बढ़ाने में लगा रहता है तो दूसरा गुट इसका विरोध करता है। इससे समाज व शिक्षा उन्नयन के कार्य नहीं हो पाते हैं। हालांकि पहले ऐसा माहौल नहीं था। करीब दो दशक से शिक्षा से जुड़े बोर्डों में राजनीतिक दखल बढ़ा है। इससे पहले शिक्षा से जुड़े अनुभवी व्यक्तियों को ही प्राथमिकता दी जाती थी, जिससे ना गुटबाजी थी और ना ही राजनीति। सिर्फ शिक्षा पर ध्यान रहता था, लेकिन अब राजनीतिक दखलंदाजी से आयोगों में शैक्षिक माहौल बिगड़ हुआ है। हर कार्य में राजनीति हावी रहती है। वर्तमान में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष प्रो. बी.एल.चौधरी है। भाजपा सरकार ने इस पद पर लगाया है। इससे पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार में प्रो. सुभाष गर्ग अध्यक्ष रहे। गर्ग कांग्रेस के राजीव गांधी स्टडीज सेंटर से लम्बे समय से जुड़े हुए हैं। इसी सेंटर से जुड़े कई व्यक्तियों को भी विश्वविद्यालय और सरकारी आयोगों में स्थान दिया गया। गर्ग के बाद कांग्रेस विचारधारा के ही पी.एस.वर्मा को अध्यक्ष पद पर लगाया। कांग्रेस के एक बड़े नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री के नजदीकी के चलते इस पद पर नवाजा गया। इससे पहले भाजपा सरकार में विमल प्रसाद अग्रवाल, भरतराम कुम्हार इस पद पर रह चुके हैं। ये दोनों भाजपा के एक वैचारिक संगठन से जुड़े रहे हैं। युवाओं को रोजगार देने का कार्य करने वाली आरपीएससी भी राजनीतिक दलों के पसंदीदा लोगों की शरणस्थली बनी हुई है। इस सरकार के पहले कांग्रेस राज में आईपीएस हबीब खां गौराण आरपीएससी अध्यक्ष बनाया, जिनके कार्यकाल में नौकरी से ज्यादा नियुक्तियों में धांधली के मामले ज्यादा सामने आए। इसी तरह भाजपा राज में वरिष्ठ आईएएस ललित के.पंवार को इस पद पर लगाया है। सेवानिवृत्ति के कुछ दिन बाद ही इन्हें यह नियुक्ति दे दी गई। इससे पहले भी कांग्रेस व भाजपा राज में अपने समर्थक राजनीतिक व्यक्तियों और अफसरों को नियुक्ति दी जाती रही है। ऐसी नियुक्तियों का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि उपकृत व्यक्ति सिर्फ पार्टी और सरकार के मुताबिक चलता है। नियुक्तियां देने तक में धांधली होती है, जिसके चलते योग्य आदमी रह जाता है। ऐसे कई धांधली संबंधित मामले सामने भी आ चुके हैं। पूर्व आरपीएससी चेयरमैन हबीब खां गौराण के खिलाफ तो एसीबी और पुलिस थाने में मामले भी दर्ज हो चुके हैं।
– विचारधारा की लड़ाई, विश्वविद्यालयों पर ताले
राजस्थान में विचारधारा की लड़ाई सरकारों में होने लगी है। किसी सरकार में कोई अभिनव कार्य शुरु होता है तो दूसरी सरकार उसे बिना सोचे समझे या तो बंद कर देती है या उसे फण्ड नहीं देती। ऐसा ही कुछ पिछली कांग्रेस सरकार में खोले गए दो विश्वविद्यालयों के मामलों में देखा गया। गहलोत सरकार में पत्रकारिता और विधि पाठ्यक्रम के लिए जयपुर में हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय एवं डॉ. भीमराव अम्बेड़कर विधि विश्वविद्यालय खोला गया। इसकी शुरुआत भी कर दी गई, लेकिन ढाई साल पहले सरकार बदलते ही इन पर संकट आ खड़ा हुआ। कांग्रेस और वामपंथी विचारधारा को आगे बढ़ाने के आरोप-प्रत्यारोप सरकार के एक वैचारिक संगठन ने लगाए। सरकार ने इन्हें बंद करने की मुहिम शुरु कर दी गई। सभी तरह के विरोध दरकिनार कर दिए गए। सरकार बदलते ही पाठ्यक्रमों में बदलाव आम बात हो गई, जिस पर विवाद होते रहते हैं। नेताओं के नाम से चलने वाली योजनाओं को बदलकर अपनी-अपनी पार्टी के नेताओं पर करना भी शगल बन गया है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नाम से संचालित योजनाओं को बंद करके अटल बिहारी वाजपेयी और पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के नाम कर दी गई है। ऐसे ही कांग्रेस राज आने पर इनका नाम बदलकर कांग्रेस नेताओं के नाम पर योजनाएं शुरु कर दी जाती है। इसी का नतीजा है कि आज भी देश में शिक्षा का ढांचा बदलते दौर के हिसाब से तय नहीं हो पा रहा है। शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी राजनीतिक दलों की वैचारिकता हावी होने लगी है, जो सिर्फ कांग्रेसी, भाजपाई, वामपंथी और दूसरे दलों की विचारधारा पैदा कर रही है। जेएनयू जैसे विवाद खड़े कर रही है। देश व समाज के विकास, गरीब व जरुरतमंदों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली शोधपरक और रोजगार देने वाली शिक्षा पर किसी का ध्यान नहीं है।
– कुलपति चयन के लिए बने कॉलिजियम
राजनीतिक दखलंदाजी से कुलपति चयन में होने वाले विवादों के चलते देश और राज्यों में चयन प्रक्रिया में बदलाव की बातें तो खूब हुई, लेकिन किसी भी सरकार ने इसमें ईमानदारी से ना तो लागू किया और ना ही नियम-कायदे बनाए। राजस्थान में कुलपति चयन विवाद उठने के बाद राज्यपाल कल्याण सिंह ने एक साहसिक पहल शुरु की है। कुलपति चयन के लिए शिक्षाविदों से आवेदन मांगने और चयन कमेटी बनाकर कुलपति चयन के दिशा-निर्देश दिए हैं। हालांकि इससे पहले भी इस तरह की पहल हो चुकी है, लेकिन हर बार नतीजे सिफर ही रहे हैं और कुलपति चयन विवादों में रहा है। पिछले यूपीए राज में भी केन्द्र सरकार ने कुलपति की पात्रता को पूरा करने वाले शिक्षाविदों का डेटावेस तैयार करने की कवायद बनाई थी, ताकि केन्द्रीय विश्वविश्वविद्यालयों में कुलपति चयन और उन्हें हटाने में राजनीतिक हस्तक्षेप को समाप्त किया जा सके। इसके लिए एक कॉलिजियम के मसौदे को मंजूरी दे दी गई, लेकिन सरकार बदले ही यह मसौदा भी ठण्डे बस्ते में चला गया। ऐसे मसौदे और नियम केन्द्र और राज्य सरकार में बनते तो बहुत है, लेकिन सत्ता में आते ही अपने लोगों को खपाने और विचारधारा को पनपने के नाम पर सारे नियम-कायदों को तिलांजलि दे दी जाती है। कुलपति चयन में विवाद तभी थम सकते हैं, जब इनमें राजनीतिक हस्तक्षेप पूर्णतया बंद हो जाए। राजनीतिक दलों, उनके अग्रिम संगठनों में कार्य करने वाले लोगों की नियुक्ति पर रोक लगे। उच्च शिक्षा में अच्छे अनुभव और रिसर्च में योगदान को चयन का बड़ा आधार माना जाए। कुलपति ही नहीं दूसरी फैकल्टी की नियुक्तियां भी योग्यता के आधार पर होनी चाहिए। राजनीतिक करने वाले शिक्षकों व लोगों को विश्वविद्लाय से दूर रखा जाए।
– वो वक्त भी था, जब सरकारें भी डरती थी

बताते है कि उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालयों में कुलपतियों का ऐसा रुतबा और दबदबा था कि सरकारें भी उनसे खौफ खाती थी। वो ऐसा दौर था, जिस समय ना तो राजनीतिक दखलंदाजी थी और ना ही शिक्षक आज की तरह कुलपति, विभागाध्यक्ष या दूसरे पदों पर नियुक्ति के लिए सरकारों व राजनीतिक दलों के पीछे भागने का रिवाज नहीं था। जो ऐसा करते थे, उनकी इज्जत भी नहीं थी। ना तो सरकार में और ना ही शिक्षकों में। उस दौर में कुलपति शासन सचिवालय में नौकरशाह और मंत्रियों का इंतजार नहीं करते थे, बल्कि किसी कुलपति के आने पर नौकरशाह उन्हें रिसीव करने पहुंचते थे और मुख्यमंत्री व मंत्री उन्हें छोडऩे के लिए बाहर तक आते थे। उस दौर के कुलपतियों के दबदबे का ऐसा ही एक वाकया काफी चर्चा में रहता है और जब भी कुलपति चयन व दूसरे मुद्दों पर बहस होती है तो इस वाकये की चर्चा शिक्षाविद जरुर करते हैं। यह वाकया पूर्व मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाडिया के समय का है। तब जयनारायण व्यास जोधपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बी.एन.झा हुआ करते थे। एक बार मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाडिया के मुंह से अनायास ही निकल गया कि विश्वविद्लाययों में तो खर्चा ही खर्चा होता है। सरकार की हालात तो पहले से ही पतली रहती है। ऐसे में विश्वविद्यालयों का खर्चा कैसे वहन करें। तब कुलपति झा ने तपाक से कहा, किसने आपको पीले चावल दिए थे कि आप विश्वविद्यालय और कॉलेज खोलें। ये कोई मुनाफा कमाने के साधन नहीं है, बल्कि शिक्षा के केन्द्र है। सरकार ने बनाया है तो पैसों की व्यवस्था भी करनी होगी और सरकार इससे भाग नहीं सकती है। इस तरह की दबंगता थी कुलपतियों में तब, लेकिन आज जब इन पदों पर शिक्षाविदों के बजाय दलों से जुड़े लोग काबिज होने लगे हैं तो इस तरह का रुतबा व दबगंता नहीं दिखेगी।

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