-जीतेन्द्र शर्मा
जयपुर। प्रदेश का जलदाय विभाग झुंझुनूं के मलसीसर स्थित आरडब्ल्यूआर टूटने के मामले में लापरवाही बरतने वाली मैसर्स एनसीसी लिमिटेड कंपनी को डी-बार करना भूल गया है। विभाग भले ही आरडब्ल्यूआर टूटने के मामले में मैसर्स एनसीसी कंपनी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के साथ ही मोटी पैनल्टी वसूलने का दावा कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ मामले की हकीकत कुछ और ही कह रही है। जलदाय विभाग के प्रमुख शासन सचिव रजत कुमार मिश्र ने मलसीसर आरडब्ल्यूआर टूटने के मामले में तत्काल कार्रवाई करते हुए मैसर्स एनसीसी कंपनी पर पौने 5 करोड़ की पैनल्टी वसूलने के साथ ही उसे 3 साल के लिए डी-बार करने के आदेश जारी किए थे, लेकिन पौने 6 माह का समय निकल जाने के बाद भी विभाग के इंजीनियर न तो कंपनी से पूरी पैनल्टी की राशि वसूल पाए है और न ही कंपनी को डी-बार करने के आदेश निकाले हैं। अब इसे मैसर्स एनसीसी कंपनी पर जलदाय विभाग के अधिकारियों की मेहरबानी नहीं कहें तो और क्या कहेंगे।

दरअसल 31 मार्च, 2018 को मलसीसर स्थित आरडब्ल्यूआर टूटने के बाद जलदाय विभाग प्रमुख शासन सचिव रजत कुमार मिश्र के साथ झुंझुनूं जिला कलक्टर और विभाग के तीन मुख्य अभियंताओं की टीम ने मलसीसर आरडब्ल्यूआर स्थल का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान प्रारम्भिक जांच में आरडब्ल्यूआर टूटने के लिए मैसर्स एनसीसी कंपनी और विभागीय इंजीनियर्स को जिम्मेदार ठहराया। प्रमुख शासन सचिव की ओर से विभाग के दो अधिशाषी अभियंताओं को दोषी मानते हुए उन्हें तत्काल सस्पेंड करने के आदेश जारी किए। दूसरी ओर कार्य में गंभीर लापरवाही बरतने वाली कंपनी को नुकसान और आरडब्ल्यूआर टूटने के लिए दोषी मानते हुए उस पर 4 करोड़ 74 लाख रूपए की पैनल्टी वसूलने के साथ ही उसे 3 साल के लिए विभाग से डी-बार करने के आदेश जारी किए थे। विभाग की ओर से दो अधिशाषी अभियंताओं को तो तत्काल प्रभाव से सस्पेंड करने के आदेश जारी कर दिए गए, लेकिन दूसरी ओर पौने 6 माह निकल जाने के बाद मैसर्स एनसीसी कंपनी से मात्र 1 करोड़ 10 लाख रूपए की वसूली की गई है। इतना ही नहंीं विभाग के अधिकारी कंपनी पर कठोरतम दण्ड के रूप में 3 साल के लिए डी-बार करने की सजा को तो भूल ही गए। पौने 6 माह का समय निकल जाने के बाद भी विभाग की ओर से आज तक मैसर्स एनसीसी कंपनी को डी-बार करने के आदेश जारी नहंी किए गए हैं। अब इसे जलदाय विभाग के इंजीनियर्स की भूल कहें या फिर मेहरबानी, लेकिन विभाग के अधिकारियों के इस कृत्य ने एक बार फिर पूरे विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आरडब्ल्यूआर तो टूटना ही था!
मलसीसर आरडब्ल्यूआर टूटने के लिए जितनी मैसर्स एनसीसी कंपनी जिम्मेदार है उतना ही जलदाय विभाग के इंजीनियर्स भी जिम्मेदार है। एनसीसी कंपनी की ओर से आरडब्ल्यूआर निर्माण के समय घटिया कार्य करने के साथ ही कई खामियां छोड़ी गई, जिन पर विभाग के इंजीनियर्स ने ध्यान नहीं दिया। जलदाय विभाग के अतिरिक्त मुख्य अभियंता प्रोजेक्ट चूरू अशोक कुमार जैन ने 3 फरवरी, 2018 और 13 मार्च, 2018 को मलसीसर आरडब्ल्यूआर निरीक्षण के दौरान आरडब्ल्यूआर-1 और आरडब्ल्यूआर-2 में से पानी का रिसाव होने का जिक्र करने के साथ ही कंपनी के अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से दुरूस्त करने के निर्देश दिए थे, लेकिन निदेर्शों की पालना पर न तो विभाग के इंजीनियर्स ने ध्यान दिया और न ही कंपनी के अधिकारियों ने लीकेज रोकने को लेकर कोई ठोस कार्रवाई की। कंपनी के अधिकारियों की ओर से आरडब्ल्यूआर का ले-आउट प्लान में भी बदलाव कर दिया था, जिस पर विभाग के इंजीनियर्स ने भी कोई ध्यान नहीं दिया। मलसीसर आरडब्ल्यूआर टूटने में कंपनी की ओर से सबसे बड़ी लापरवाही बरती गई। कंपनी की ओर से आरडब्ल्यूआर का निर्माण होने के बाद उससे पाइपलाइन का आउटलेट निकाला गया था। पाइपलाइन के आउटलेट से लगातार पानी का रिसाव हो रहा था, जिससे रेतीली मिट्रटी में कटाव शुरू हो गया और आरडब्ल्यूआर टूट गया। सू़त्रों के अनुसार आरडब्ल्यूआर से लगातार हो रही पानी की छीजत से मैसर्स एनसीसी कंपनी के अधिकारी काफी परेशान थे और उन्हें आरडब्ल्यूआर में बढ़ती परेशानियों के चलते टूटने का खतरा हर वक्त सताता रहता था। 31 मार्च को कंपनी के अधिकारियों का अंदेशा आरडब्ल्यूआर टूटने के साथ ही हकीकत में बदल गया।

आईआईटी देहली से आईआईटी मुंबई को जांच क्यों?
मैसर्स एनसीसी कंपनी द्वारा मलसीसर में निर्मित आरडब्ल्यूआर के टूटने के मामले में जलदाय विभाग द्वारा मैसर्स एनसीसी कंपनी के खर्चें पर आईआईटी देहली से तकनीकी जांच कराने का सक्षम स्तर पर निर्णय लिया गया। मुख्य अभियंता स्पेशल प्रोजेक्ट की ओर से 14 मई, 2018 को अतिरिक्त मुख्य अभियंता प्रोजेक्ट चूरू को पत्र भेजकर अवगत कराया गया। अतिरिक्त मुख्य अभियंता प्रोजेक्ट चूरू की ओर से 16 मई, 2018 को 82.60 लाख रूपए आईआईटी देहली में जमा कराने के लिए मैसर्स एनसीसी कंपनी को पत्र लिखा गया, जिसके जवाब में मैसर्स एनसीसी कंपनी ने 22 मई, 2018 को विभाग को पत्र लिखकर अवगत कराया कि कंपनी ने जांच आईआईटी मुंबई से कराने का निर्णय लिया है। कंपनी के इस निर्णय को जलदाय विभाग अधिकारियों ने तत्काल मान भी लिया। अब सवाल उठता है कि जब विभाग ने सक्षम स्तर से आईआईटी देहली से जांच कराने का निर्णय ले लिया तो फिर कंपनी कैसे विभाग के निर्णय को बदल सकती है? और खुद अपने स्तर पर कैसे आईआईटी मुंबई से जांच कराने का निर्णय ले सकती है। इससे भी बड़ा सवाल उठता है विभाग के अधिकारियों पर, जिन्होंने कंपनी के द्वारा सुनाए गए निर्णय को तुंरत मान लिया।

ब्लैकलिस्ट एनसीसी को सौंप दिए 2734 करोड़ के वाटर प्रोजेक्ट
मैसर्स एनसीसी कंपनी को घटिया कार्यों और फजीर्वाड़ों के चलते वर्ष 2011-12 में पाण्डुचेरी, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश और झारखण्ड राज्यों में ब्लैकलिस्ट चल रही थी। तब राजस्थान का जलदाय विभाग मैसर्स एनसीसी कंपनी पर खूब मेहरबान हुआ। कई मामलों में सीबीआई जांच में फंसी और ब्लैकलिस्ट चल रही मैसर्स एनसीसी कंपनी को राजस्थान में वर्ष 2012 और 2013 में जलदाय विभाग ने 2 हजार 734 करोड़ की लागत के 10 वाटर प्रोजेक्टों का कार्य सौंपा गया था। ब्लैकलिस्ट कंपनी को राजस्थान में हजारों करोड़ के काम सौंपे जाने को लेकर 6 मार्च, 2013 को तत्कालीन मुख्यमंत्री, जलदाय मंत्री, जलदाय विभाग प्रमुख शासन सचिव और जलदाय विभाग मुख्य अभियंता स्पेशल प्रोजेक्ट को शिकायत भी प्राप्त हुई थी, लेकिन कंपनी पर पूरी तरह से मेहरबान विभाग ने शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की। उसी का नतीजा है कि राजस्थान में कंपनी का एक भी काम निर्धारित समय पर पूरा नहीं हुआ, जिसकी खामियाजा प्रदेश की करोड़ों जनता को पेयजल संकट से जूझकर उठाना पड़ रहा है।

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