Road accident

सड़कें लहुलुहान हो रही है। देशभर में 400 लोग और राजस्थान में 29 लोग रोजाना सड़क हादसों में अपनी जान गंवा देते है। राजधानी जयपुर में औसतन प्रतिदिन दो से तीन काल के ग्रास बन रहे हैं। कहीं शराब के नशे में धुत्त रईसजादे और शराबी चालक तेज स्पीड में वाहनों को चलाकर राहगीरों व दूसरे छोटे वाहनों को कुचल रहे हैं तो कही ड्राइवर की लापरवाही से दुर्घटना हो रही है। इनके अलावा देश व प्रदेश में खराब रोड इंजीनियरिंग भी हादसों का बड़ा कारण बनकर सामने आ रही है। भ्रष्टाचार के कारण सड़क निर्माण और मरम्मत इंडियन रोड़ कांग्रेस के नियमों के तहत नहीं हो रहा है। ड्राइविंग में लापरवाही से हुए सड़क हादसे आमतौर पर उजागर हो जाते है लेकिन, खराब रोड़ इंजीनियरिंग के कारण हुए हादसे पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होने से सामने नहीं आ पाते। जबकि देखा जाए तो इन हादसों में घायल होने वालों की तादाद सरकारी आंकड़ों के मुकाबले कई गुणा अधिक है। जयपुर की लेडी बाइकर वीनू पालीवाल को खराब रोड इंजीनियरिंग के चलते क्षतिग्रस्त सड़क पर बाइक फिसलने से जान गंवानी पड़ी। पीडि़त और उसका परिवार आर्थिक, मानसिक और शारीरिक तौर पर खासा परेशान होता है। कई बार तो ये हादसे जिन्दगीभर के लिए जख्म पीडि़त को दे जाते है। सड़क हादसों विभिन्न कारणों पर फोकस करती  राकेश कुमार शर्मा की रिपोर्ट-
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जयपुर। राजधानी जयपुर के पॉश इलाके अशोक मार्ग पर एक जुलाई की आधी रात बाद विधायक नन्दकिशोर महरिया के बेटे सिद्धार्थ महरिया (जो शराब के नशे में धुत्त थे) की बीएमडब्ल्यू कार ने एक ऑटो रिक्शा को टक्कर मार दी और इस हादसे में तीन लोगों की मौत हो गई जबकि कुछ लोग घायल हो गए। हिट एंड रन का मामला दर्ज कर पुलिस ने इस हाई प्रोफाइल केस की पड़ताल शुरू कर दी। प्रारंभिक तौर पर इस मामले में दोनों वाहनों की गति काफी तेज होने की बात सामने आ रही है। कहा जा रहा है कि बीएमडब्ल्यू की गति 100 किलोमीटर प्रतिघंटा से अधिक थी। जहां हादसा हुआ उस चौराहे पर दिन में पुलिसकर्मी रहते है लेकिन, रात को यहां ट्रेफिक लाइट भी बन्द रहती है। इस चौराहे पर कोई स्पीड़ ब्रेकर भी नहीं है। इस घटना के बाद जयपुर में दो बड़े हादसे ओर हो चुके हैं, जिसमें दो जनों की मौत और आधा दर्जन घायल हो चुके हैं।
इसी तरह भीलवाड़ा जिले के बदनौर इलाके में छह जुलाई को भीषण सड़क हादसा हुआ। ट्रेलर और ट्रॉली में टक्कर हुई और इसमें 13 लोगों की जान चली गई। इसके अगले दिन यानि सात जुलाई को सिरोही में भी ऐसा ही सड़क हादसा हुआ और इसमें भी 13 लोगों ने जान गंवा दी। यह हादसा बस और ट्रोले में टक्कर से हुआ। बस पलट कर सड़क पर खड़ी सवारियों पर गिर गई। जुलाई के दो सप्ताह के दौरान हुए इन हादसों में तीन दर्जन लोगों की मौत हो गई। इससे तीन गुणा संख्या में घायल हुए हैं। देखा जाए तो प्रदेश में सड़क हादसों में लगतार बढ़ोतरी हो रही है। हादसों में जान गंवाने वालोंं और घायलों की संख्या का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है।
केन्द्र सरकार के सड़क परिवहन मंत्रालय की ओर से हाल में जारी की गई रिपोर्ट भी साबित करती है कि जयपुर समेत राजस्थान की सड़कें सुरक्षित नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक सड़क हादसों के मामलों में राजस्थान का देश में आठवां तथा इन हादसों में मरने वालों की संख्या के लिहाज से पांचवें स्थान पर है। यह रिपोर्ट केवल 13 राज्यों की है। राजस्थान में पिछले साल कुल 24072 सड़क हादसे हुए है। यानि औसतन 66 हादसें रोजाना हुए हैं। इन हादसों में कुल 10516 लोगों की जानें गई। यानि की हर दिन औसतन 29 लोगों की जान इन हादसों में चली जाती है। वैसे राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति देखे तो कम भयावह नहीं है। कम से कम 400 लोगों की जान रोजाना सड़क हादसों में चली जाती है। ओवरटेक, शराब पीकर वाहन चलाने या फिर वाहन की तेज गति हादसों का कारण बन रही है। केन्द्र सरकार की रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल देश में जितने भी सड़क हादसें हुए हैं उनमें से 77 फीसदी मामलों में ड्राइवर की गलती या लापरवाही वजह रही है।
राजस्थान में पिछले साल सड़क हादसों में जितने जानें गई हैं उनमें 5771 यानि की 51 फीसदी 18 से 34 साल के युवा थें। वर्ष 2015 में कुल 24072 सड़क हादसें हुए थें। इनमें 10510 की जान गई जबकि 26153 लोग घायल हुए है। इस रिपोर्ट में एक बड़ी बात यह भी ज्यादातर हादसे ग्रामीण इलाकों में हुए है। कुल हादसों में 8648 शहरी और 15424 हादसे ग्रामीण इलाकों में हुए। मतलब शहर की तुलना ग्रामीण इलाकों में दो गुणा हादसे हुए हैं।
– स्पीड बन रहा है फैशन
वाहनों के नित नए मॉडल लांच हो रहे हैं। कम्पनियां भी सुरक्षा मानकों के स्थान पर स्पीड़ को तबज्जों दे रही है। जयपुर में हुए बीएमडब्ल्यू हादसा इसका ताजा उदाहरण है। हाई प्रोफाइल लोगों की पंसद इस कार को 100-150 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से दौड़ाना फैशन है। वाहन कम्पनियों की बिक्री रिपोर्ट बताती है कि हाल के पांच-छह साल में चौपहिया वाहनों में एंट्री लेवल प्राइमरी सेंगमेंट के तुलना लग्जरी कारों की बिक्री बढ़ी है। खासकर एसयूवी की बिक्री में इजाफा हुआ है। इसी तरह की स्थिति दुपहिया वाहनों में भी है। 150 सीसी से अधिक वाहनों की बिक्री में बढ़ोतरी हो रही है। यानि की स्पीड फैशन बन रहा है। दूसरी तरफ जितने भी सड़क हादसे होते है उनकी वजह वजह बेलगाम स्पीड़ होती है। तेज गति से वाहन चलाने के दौरान ओवरटेक की स्थिति में सामने से दूसरा वाहन आ जाता है तो अक्सर ड्राइवर वाहन पर से अपना नियंत्रण खो देता है और हादसा हो जाता है।
– लापरवाही की रोड़ इंजीनियरिंग
दौसा जिले में लालसोट-गंगापुर रोड पर करीब दो साल पहले एक महिला निविदिता जैन की सड़क हादसे में कुछ लोगों की लापरवाही के कारण जान चली गई। इस रोड पर एक धर्म स्थल के पास लोगों ने खंभा डालकर स्पीड ब्रेकर बना रखा था। इस पर बाइक उछली तो और पीछे बैठी निविदिता एक पत्थर पर जा गिरी। जबकि नियमानुसार यह राजमार्ग है और इंडियन रोड कांग्रेस के नियमों के मुताबिक इस तरह के स्पीडब्रेकर बनाए नहीं जा सकते है। एक छोटी सी लापरवाही से इस महिला की जान चली गई और पूरा परिवार आज भी इस लापरवाही का परिणाम भुगत रहा है।
इसी तरह का एक हादसा जयपुर के रामगढ़ मोड इलाके में कुछ दिन पहले हुआ है। बिजली का खंभा लगाने के लिए यहां गड्डा खोदा था। अंधेरे के कारण यह गड्डा दिखाई नहीं दिया और वहां से गुजर रहा एक वाहन चालक उसमें गिर गया। व्यक्ति के सिर में गहरी चोट आई और उसने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।
ये दो हादसे हमारे देश की खराब रोड़ इंजीनियरिंग के उदाहरण है। सड़कों के निर्माण के समय बरती गई तकनीकी लापरवाही और टूटी सड़कें तथा गड्डे भी हादसों के लिए जिम्मेदार है। गांव हो अथवा शहर, यहां तक ऐसे शहर जिन्हें आदर्श माना जाता है वहां भी सड़कों की स्थिति बदहाल है। बड़ी संख्या में लोग इन सड़कों की वजह से दुर्घटनाओं का शिकार हो कर अपने हाथ-पैर तुड़वा बैठते है। दिखने में छोटे होने और कानूनी पचड़ों में नहीं पडऩे की मंशा के कारण इनकी रिपोर्ट नहीं कराई जाती। इसलिए ये दुर्घटनाओं संबंधी सरकारी आंकड़ों में शामिल नहीं हो पाते। इस तरह के हादसे दुपहिया वाहन चालकों के साथ होते है। देखा जाए तो इन दुर्घटनाओं में घायल होने वालों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कई गुणा ज्यादा है। केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी इस तथ्य को स्वीकार करते है। उन्होंने माना कि 77 फीसदी हादसे ड्राइविंग में लापरवाही से होते है। लेकिन, खराब रोड़ इंजीनियरिंग से भी दुर्घटनाएं बढ़ रही है। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए उन्होंने ठोस कदम उठाने की जरूरत बताई।
– भ्रष्टाचार से बिगड़ रही है रोड़ इंजीनियरिंग
रोड इंजीनियंरिंग पूरे भारत में ही बिगड़ी हुई है। बड़े से बड़ा शहर हो या फिर गांव, वीवीआईपी इलाकों को छोड़ दे तो सभी जगह पर सड़कें बदहाल ही नजर आएगी। लोग खासे परेशान है और उनकी कोई सुनवाई नहीं होती। सरकार की ओर से सड़कों के सुधार के लिए की गई टाइम बॉण्ड घोषणाएं भी थोथी साबित हो रही है। जिन महकमों के पास सड़कें बनाने की जिम्मेदारी है उनमें भ्रष्टाचार की जड़े गहरी है। इंजीनियर पूरी तरह लापरवाह है और ठेकेदारों की जमकर मनमानी होती है। ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जिनमें बिना सड़क बने ही उसका पैसा मिलकर हजम कर लिया गया या फिर तय मापदंडों के मुताबिक सड़कें बनाई ही नहीं और पैसा पूरा उठा लिया गया। ज्यादातर मामलों में जनप्रतिनिधियों की भी मिलीभगत रहती है जिसके चलते घटिया सड़क बनाने वालों पर कोई असरदार कार्रवाई नहीं हो पाती।
प्रदेश में सड़कें बनवाने की जिम्मेदारी कई संस्थाओं के पास है। राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने का काम राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण करवाता है। अन्य इलाकों में संबंधित संस्थाएं जैसे नगर पालिका, नगर परिषद या नगर निगम, विकास प्राधिकरण या नगर सुधार न्यास, हाउसिंग बोर्ड, रीको, आरयूआईडीपी, सार्वजनिक निर्माण विभाग, राजस्थान राज्य सड़क विकास निगम, मंडी समितियां, ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद आदि कई संस्थाओं के पास सड़कों के निर्माण की जिम्मेदारी है। एक मोटे अनुमान के अनुसार, पूरे राज्य में हर साल विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से पांच हजार करोड़ रूपए से अधिक का बजट सड़कों के लिए मंजूर किया जाता है। यदि इतनी राशि हर साल सड़कों पर खर्च हो तो शायद राजस्थान सड़कों की बेहतर स्थिति के मामले में देश में अव्वल बन जाता। पर, ऐसो नहीं हो रहा है।
सड़कें बनती है और चार-छह महीने में ही उखडऩा शुरू हो जाती है और इसका एक प्रमुख कारण बरसात बताकर संबंधित अफसर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते है। ज्यादा हो हल्ला मचता है तो ठेकेदार पर पेनल्टी कर दी जाती है। पेनल्टी की राशि इस नुकसान की तुलना नाममात्र की होती है। सड़कें टूटने की वजह बरसात को बनाने के पीछे पूरी साजिश रहती है। आमतौर पर सड़कें बारिश के आसपास के दिनों में बनाई जाती है। डामर पर पानी आने से उसकी चिपक छूट जाती है। ऐसे में कोई जांच नहीं हो पाती है। सड़कों का निर्माण ठेकेदारों के भरोसे छोड़ दिया जाता है और इंजीनियर तथा दूसरे अफसर कमीशन खाकर उसके काम को पास कर देते है। जब इंजीनियर या अफसर पर जिम्मेदारी की बात आती है तो सड़क किसी दूसरे के कार्यकाल में बनी बताकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। सड़क निर्माण की अब नई तकनीकें आ चुकी है लेकिन, उनका इस्तेमाल बहुत कम हो रहा है और ज्यादातर जगह परम्परागत तरीके से ही सड़कें बनाई जा रही है।

– नहीं किया जाता है ट्रेफिक सर्वे
इंडियन रोड़ कांग्रेस (आईआरसी) के नियमों के मुताबिक किसी भी सड़क के निर्माण से पहले वहां ट्रेफिक का सर्वे किया जाना चाहिए। इस सर्वे के आधार पर यह जानकारी जुटाई जाती है कि जहां सड़क बनाई जानी है वहां ट्रेफिक कितना है। उसके आधार पर सड़क निर्माण की तकनीक, मोटाई, मैटेरियल के मापदंड तय होते है। वीवीआईपी क्षेत्र और राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण से पहले इस तरह का सर्वे जरूर किया जाता है लेकिन, अन्य जगह सड़क निर्माण के मामले में केवल खानापूर्ति होती है। इसका नतीजा यह रहता है कि सड़कें ट्रेफिक का दबाव सहन नहीं कर पाती है और वे जल्दी टूट जाती है। इसका उदाहरण जयपुर में कई इलाकों में देखा जा सकता है। जयपुर में मेट्रो रेल परियोजना का काम चल रहा है और इसके लिए कुछ इलाकों में ट्रेफिक डायवर्ट किया गया है। जिन इलाकों से ये ट्रेफिक निकाला जा रहा है उन इलाकों में सड़के पूरी तरह टूट चुकी हैं। जयपुर में सिंधी कैम्प बस स्टैंड के आसपास का इलाका भी इस तरह की लापरवाही का उदाहरण है। यहां बसों की आवाजाही रहती है जबकि सड़क सामान्य मापदंडों के हिसाब से बनाई गई थी। इससे सड़क कई जगह टूट चुकी है। झोटवाड़ा रोड़ पर प्री-कॉस्ट सीमेंट के ब्लॉक की सड़क बनाई गई लेकिन, वह भी ट्रेफिक का दबाव नहीं झेल पा रही है और जगह-जगह टूटी पड़ी है। शहर मेंं जहां-जहां भी प्री-कॉस्ट सीमेंट ब्लॉक की सड़कें बनाई गई वहां सभी जगह की यहीं स्थिति है। शहर की अन्दरूनी इलाकों की सड़कों का तो हाल और भी ज्यादा बुरा है। पहले वाहनों की संख्या सीमित थी लेकिन, अब वाहन बढ़ गए और इन इलाकों में आवाजाही भी बढ़ रही है, इससे सड़कें टूट रही है। कई इलाकों में तो सड़कें बने ही कई साल बीत गए। शहर में हजारों कॉलोनियां ऐसी है जो गैरकानूनी तरीके से बस गई है। वहां पर सड़कें है ही नहीं। अजमेर रोड, पृथ्वीराज नगर, सिरसी रोड, कालवाड़ रोड, आगरा रोड, टोंक रोड, पर ऐसी हजारों कॉलोनियां है जहां रास्ते है लेकिन, सड़क नहीं है। लोगों को उबड़-खाबड़ रास्ते से आना-जाना पड़ता है। यह तो राजधानी की सड़कों का हाल है। इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि प्रदेश के बाकी शहरों और खासकर ग्रामीण इलाकों में सड़कों की क्या स्थिति होगी ?
आईआरसी ने सड़कों की मरम्मत और निर्माण के नियम बनाए है। टूटी हुई सड़क की मरम्मत के लिए पहले उस एरिया की साफ किया जाता है और उसके बाद मिट्टी-गिट्टी डालकर डामर डालनी चाहिए। इसका पालन कही नहीं होता। पहले तो मरम्मत की ही नहीं जाती और कही शिकायत पर काम भी होता है तो वहां केवल घटिया डामर डालकर खानापूर्ति कर दी जाती है। करोड़ों रूप्ए का बजट हर साल सड़कों के पेचवर्क के लिए विभिन्न विभाग खर्च करते है। पूरे इलाके में भी सड़क बनने से पहले पुरानी सड़क की परत का हटाने के नियमों की अनदेखी की जाती है। यानि की सड़क पर सड़क बना दी जाती है। इससे गुणवत्ता में तो कमी आती है साथ ही वहां रहने वाले लोगों की भी परेशानी बढ़ जाती है। मकान के लेवल से सड़क उंची हो जाती है और पानी भरने की समस्या हो जाती है। जयपुर में नीलगरों का नाला, पुरानी बस्ती, मानसरोवर में कई जगह ऐसे उदाहरण देखने को मिल जाएंगे जहां सड़क का लेवल मकान के लेवल से अधिक है और यहां पानी भरने की समस्या रहती है। इसी तरह सड़क बनाने समय ढाल का भी ध्यान नहीं रखा जाता है जिससे पानी भरने की समस्या बनी रहती है। पानी भरने से सड़क भी जल्दी टूट जाती है। सड़कों का निर्माण प्वाइंट टू प्वाइंट होना चाहिए। यानि की रास्ते के दोनों छोरों की अंतिम सीमा तक निर्माण किया जाना चाहिए। अक्सर बीच में सड़क बना दी जाती है और दोनों ओर तीन से पांच फुट की जगह छोड़ दी जाती है।
– एक सड़क बनाता है दूसरा खोद देता है
सड़क बनाने से पहले विभिन्न विभागों के बीच तालमेल नहीं होता है। एक विभाग सड़क बनाता है और दूसरा विभाग वहां पानी, बिजली या अन्य सर्विसेज की लाइन डालने के लिए खोद जाता है। इसको लेकर कई बार निर्णय भी हो चुके है और विभिन्न विभागों में तालमेल के लिए कमेटियां भी बनी हुई है लेकिन, वह केवल कागजों में ही काम कर रही है। यहीं नहीं राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण में भी जमकर लापरवाही बरती जा रही है। इसका उदाहरण जयपुर-दिल्ली राजमार्ग और जयपुर-बीकानेर राजमार्ग है। दोनों पर ही सड़क को कई जगह घुमाव दिया है। कुछ तो काफी खतरनाक है और इन स्थानों पर वाहनों के टकराने एवं पलटने की घटनाएं काफी हो रही है। प्राधिकरण ने यहां घुमाव होने के संकेतक लगाकर अपनी लापरवाही पर पर्दा डाल दिया। जबकि आईआरसी के नियमों के मुताबिक राजमार्ग सीधे होने चाहिए और यदि कहीं उन्हें घुमाया जाता है भी तो उसके नियम है। इन दोनों ही राजमार्ग पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर घुमाव बना दिए। इसी तरह डिवाइडर पर कट एवं पुलियाओं का निर्माण भी प्रभावशाली लोगों के दबाव को ध्यान में रखकर किया गया है जिससे दुर्घटनाएं बढ़ रही है। अधिकांश राजमार्ग टोल रोड बन चुके हैं। वाहनों से भारी-भरकम टोल टैक्स वसूला जा रहा है, लेकिन फिर भी सड़कें बदहाल है। ना तो मरम्मत की व्यवस्था है और ना ही हादसे रोकने के इंतजाम। जयपुर-दिल्ली राजमार्ग पर टोल टैक्स वसूलने के बावजूद खराब सड़कों के हालात को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट भी तल्ख टिप्पणी कर चुका है, लेकिन ना केन्द्र सरकार और ना ही राज्य सरकार ठोस कदम उठा पा रही है। रखरखाव के नाम पर टोल वसूलने वाली कम्पनी केवल खानापूर्ति कर रही है।
– घट रही है वाहनों की उम्र
टूटी हुई सड़कें जानलेवा तो साबित होने के साथ-साथ आम व्यक्ति की जेब पर भारी पड़ रही है। खराब सड़कों की वजह से वाहनों की उम्र आधी ही रह जाती है और बार-बार कलपुर्जे खराब होने से आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। परिवहन विभाग के नियमों के अनुसार गैर व्यवसायिक वाहन की औसत उम्र 25 साल होती है और इसके आधार पर वाहन का रजिस्ट्रेशन किया जाता है। ज्यादा उपयोग को देखते हुए व्यवसायिक वाहन का रजिस्ट्रेशन कम अवधि के लिए किया जाता है।
जबकि देखा जाए तो पांच-सात साल में वाहन खस्ता हालात में नजर आने लगता है। जिसकी वजह खराब सड़कें है। उबड़-खाबड़ रास्ते पर वाहन चलाने की मजबूरी के कारण ईंधन की खपत बढ़ जाती है और कलपुर्जे भी जल्दी खराब हो रहे है। ऑटो पाटर््स कम्पनियां क्लच वायर एवं ब्रेक वायर के लिए 10 हजार किलोमीटर की लाइफ का दावा करती है यानि कि 10 हजार किलोमीटर के बाद इन्हें बदलने की जरूरत पड़ेगी। लेकिन, पांच-छह हजार किलोमीटर के बाद ही इन्हें बदलने की जरूरत पड़ जाती है। गड्डों की वजह से बार-बार ब्रेक लगाने एवं क्लच दबाए रखने से क्लच प्लेट भी जल्दी ही खराब हो जाती है। इसी तरह चौपहिया वाहनों में आए दिन कमानियां इनकी वजह से टूट रही है। इन सबका भार जेब पर पड़ रहा है।
-जिम्मेदार महकमें मैनेजमेंट की जगह कमाई में व्यस्त
खराब रोड इंजीनियरिंग के साथ-साथ टे्रफिक मैनेजमेंट भी हादसों के लिए जिम्मेदार है। ट्रेफिक पुलिस, थाना पुलिस और ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के पास ग्रामीण और शहरी इलाकों में ट्रेफिक मैनेजमेंट की जिम्मेदारी है। ट्रेफिक सुधार के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं की जाती है और रोज नए प्लान बनाए जाते है, लेकिन, वे सब जमीनी हकीकत से परे होते है। दरअसल मैनेजमेंट की जगह कमाई इनका उद्देश्य रहता है। इसलिए जो भी योजनाएं बनती है वह फेल हो जाती है और स्थिति वहीं ढाक के तीन पात वाली रहती है। ड्राइविंग लाइसेंस, व्हिकल रजिस्ट्रेशन, व्हिकल फिटनेस देने की जिम्मेदारी इस डिपार्टमेंट की है। इन कामों में फर्जीवाड़े की जितनी शिकायतें सामने आती है, उतनी शायद ही किसी की मिलती होगी। घूस लेकर अपात्र व्यक्तियों को बिना ट्रायल के लाइसेंस जारी कर दिए जाते हैं। आरटीओ दलालों के कब्जे मेें है। स्थिति यह है कि पैसे देकर किसी का भी लाइसेंस बनवा सकते है। दफ्तर में कैमरे लगाए जाने और मीडिय़ा में कई बार स्टिंग ऑपरेशन के बाद भी दलालों के हौसले बुलन्द है। स्थिति यह है कि 1500 रूपए से तीन हजार रूपए लेकर दलाल बिना ट्रायल के चौपहिया वाहन चलाने का लाइसेंस दिलवा देते है। यही स्थिति वाहनों के फिटनेस प्रमाण-पत्र की रहती है। घूस लेकर अपफिट को भी फिट साबित किया जा रहा है। दुर्घटनाओं को रोकने के लिए बसों में स्पीड गर्वनर लगाने के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है।
ओवरलोडिंग सवारियों से भरी बसें-जीप राजमार्गों पर बेखौफ दौड़ती नजर आ जाएगी। जीपों की स्थिति तो यह रहती है कि इनमें क्षमता से दो गुनी सवारियां ठूस ली जाती है। यही स्थिति बसों की रहती है, रोक के बावजूद सवारियों को छतों पर बिठा लिया जाता है। मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट में इस तरह की लापरवाही को भी दुर्घटनाओं की बड़ी वजह माना है। इन्हें रोकने के लिए उडऩदस्तों की व्यवस्था है लेकिन, मासिक बंधी के कारण वे कार्रवाई नहीं करते है। चालान जैसी कार्रवाई केवल दिखावे के तौर पर या फिर राजस्व वसूली के लक्ष्य को पूरा करने के लिए की जाती है। एक तथ्य यह भी है कि अधिकतर बसें, भारी वाहन एवं जीप प्रभावशाली नेताओं और अफसरों के रिश्तेदारों की होने से भी कार्रवाई नहीं की जाती है।
कमोबेश यही हालात ट्रेफिक पुलिस के है। हादसों को रोकने के लिए ट्रेफिक पुलिस की ओर से समय-समय पर जांच अभियान चलाए जाते है लेकिन, यह केवल चौथ वसूली या फिर पुलिस कर्मियों को सौंपे गए राजस्व वसूली का लक्ष्य पूरा करने तक ही सीमित रहता है। पुलिस कर्मी चौराहों पर यातायात व्यवस्था सम्हालने की बजाय केवल चालान बनाने में व्यस्त रहते है।
जयपुर में हाल में चौराहों पर लालबत्ती लगाने के नाम पर जमकर खर्च किया गया है लेकिन, ये लाइटें भी बिना सर्वे के मनमाने ढंग से लगा दी गई। जयपुर शहर की आदर्श सड़क मानी जाने वाली जवाहरलाल नेहरू मार्ग इसका उदाहरण है। रामनिवास बाग से जवाहर सर्किल तक करीब सात किलोमीटर में करीब एक दर्जन चौराहों पर ट्रेफिक लाइटें है। कुछ चौराहों को तो केवल आसपास प्रभावशाली लोगों के भवनों को फायदा पहुंचाने के लिए रखा गया है। इसी तरह की स्थिति टोंक रोड, न्यू सांगानेर रोड, अजमेर रोड की है।
परिवहन विभाग के एक आयुक्त ने हादसों में कमी लाने के लिए कुछ साल पहले कई महत्वपूर्ण आदेश निकाले थें। इनमें से एक आदेश था कि ओवरलोडिंग वाहनों के संचालन के लिए सम्बन्धित थाना भी जिम्मेदार होगा। यानि की जिस थाना इलाके में से ऐसे वाहन गुजरेंगे, उस थाने के स्टाफ के खिलाफ भी कार्रवाई होगी। इस अधिकारी के विभाग से जाते ही आदेश को दबा दिया गया। आज तक इस आदेश के अनुसार किसी भी पुलिसकर्मी पर कार्रवाई नहीं की गई। थाना पुलिस भी केवल डरा धमकाकर वसूली में लगी रहती है।
चालान के नाम पर चौथ वसूली का खेल
परिवहन विभाग हो या फिर पुलिस, सालाना राजस्व वसूली का लक्ष्य तय होते है। इसी के आधार पर अफसरों की कार्यकुशलता परखी जाती है। जिस अधिकारी के कार्यकाल में विभाग जितनी ज्यादा कमाई करेगा, वह अधिकारी उतना ही अधिक योग्य माना जाता है। इस व्यवस्था के चलते परिवहन और पुलिस विभाग के अधिकारी-कर्मचारी अधिक से अधिक चालान बनाने में जुटे रहते है। लेकिन, इसमें भी खेल होता है। पहले वाहन चालक को कई धाराओं में चालान काटने की धमकी दी जाती है। इससे वाहन चालक घबरा जाता है। इस दौरान उस चालक को कई पुलिसकर्मी घेर लेते है। बाद में इनमेंं से एक सेटलमेंट के नाम पर रिश्वत लेकर किसी एक धारा में चालान काटकर मामला रफा दफा करवा देता है। इस तरह चालान के टारगेट पूरा करने के साथ-साथ चौथवसूली भी कर ली जाती है। हाल ही जयपुर के सांगानेर क्षेत्र में चौथवसूली के चक्कर एक भारी वाहन का आरटीओ दस्ते की जीप पीछा कर रही थी। तेज गति से भगाने के चक्कर में भारी वाहन पलट गया और उसके नीचे दबने से एक राहगीर छात्र की मौत हो गई। ऐसे चौथवसूली के चक्कर में कई हादसे सामने आ चुके हैं।

-छह महीने में 15 सौ मौतें
पुलिस के रिकॉर्ड के मुताबिक इस साल एक जनवरी से लेकर जून माह तक राजस्थान में करीब 1500 लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवा चुके हैं। सबसे ज्यादा हादसे राजधानी जयपुर में हुए हैं। लेकिन, सबसे ज्यादा मौतें पाली में हुई है। पुलिस के रिकॉर्ड के अनुसार, राजस्थान के 19 प्रमुख शहरों में इन छह महीनों में 3289 सड़क हादसे हुए है। इनमें कुल 1395 लोगों की जान गई है। इन शहरों के अतिरिक्त अन्य शहरों में भी हादसे हुए है और उनमें भी बड़ी संख्या में लोगों की जान गई। जयपुर में कुल 400 सड़क हादसे हुए है और इनमें 200 लोगों की मौत हुई है। सड़क हादसों के मामले में दूसरे नम्बर पर पाली है। पाली में कुल 347 हादसें हुए और इनमें 203 लोगों की जान गई। यानि कि पाली में जयपुर से भी ज्यादा मौतें हुई है। तीसरे नम्बर पर बारां है। वहां 232 हादसों में 91 लोगों की जान गई है। धौलपुर में 160 हादसों में 85, भरतपुर में 315 हादसों में 160, श्रीगंगानगर में 93 हादसों में 21, राजसमन्द में 96 हादसों 137, झालावाड़ में 242 हादसों में 122, कोटा में 329 हादसों में 51, बून्दी में 329 हादसों में 71, बारां में में 232 हादसों में 91, बाड़मेर में 244 हादसों में 145, जैसलमेर में 48 हादसों में 18, बीकानेर में 90 हादसों में 25, उदयपुर में 304 हादसों में 63, सिरोही में 168 हादसों में 91, जालौर में 60 हादसों में 22 लोगों की मौत हुई है। सबसे भीषण हादसे जुलाई के पहले सप्ताह में भीलवाड़ा और सिरोही में हुए है। इन दोनों ही हादसों में दो दर्जन से अधिक लोग मारे गए है।
क्या कहता है कानून………….
एडवोकेट धर्मेन्द्र जैन के अनुसार, वाहन टक्कर के मामले में किसी के घायल होने या मौत होने पर मोटर व्हिकल एक्ट में कार्रवाई होती है। इसमें मुआवजा दावा और आपराधिक प्रकरण अलग-अलग चलते हैं। लेकिन, सड़क पर खराब रोड इंजीनियरिंग के कारण हादसा हो जाए तो कानून में स्पष्ट कुछ नहीं है लेकिन, पीडि़त चाहे तो सम्बंधित अधिकारी एवं संस्था के खिलाफ मामला दर्ज करा सकता है। वह उपभोक्ता मंच अथवा सिविल कोर्ट के माध्यम से मुआवजा प्राप्त करने का हकदार बनता है। सड़क निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी सरकार तथा संबंधित शहरी निकाय, विकास संस्था या फिर नेशनल हाइवे ऑथरिटी, जिसका भी एरिया होता है, उसकी होती है। आमतौर पर जागरूकता की कमी और लंबी कानूनी पेचदगियों के कारण लोग इस तरह की कार्रवाई से बचते है। रोड टैक्स, टोल टैक्स, शहरी निकायों से संबंधित कर देने एवं लाभान्वित पक्षकार होने के कारण पीडि़त उपभोक्ता की श्रेणी में आ जाता है और वह उपभोक्ता मंच के माध्यम से मुआवजे के लिए दावा कर सकता है।

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