नई दिल्ली। देश में केन्द्र सरकार की आर्थिक मामलों से संबद्ध नीतियों को अमलीजामा पहनाने में अहम माने जाने वाले नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढिय़ा ने अपने पद से इस्तीफो दे दिया है। हालांकि उनके इस फैसले पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने कोई फैसला नहीं किया है। फिर भी पनगढिय़ा के इस्तीफे से सरकार के आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को एक बड़ा धक्का लगा है।

अरविंद पनगढिय़ा के इस्तीफे के पीछे जो कारण उभरकर सामने आया वो यह कि उन्हें कोलंबिया यूनिवर्सिटी से बार-बार बुलावा आ रहा है। वहीं पनगढिय़ा का झुकाव भी अध्यापन कार्य की ओर ज्यादा है। जिससे उन्होंने यह निर्णय लिया है। हालांकि उनके इस्तीफे के कारण अभी खुलकर सामने नहीं आए हैं। इस संबंध में उन्होंने पीएमओ को भी अवगत करा दिया है। पीएम नरेन्द्र मोदी के असम में बाढ़ प्रभावित इलाकों के दौरे पर होने के कारण अभी आखिरी फैसला नहीं हुआ है।

-अर्थशास्त्र के प्रकांड अनुभवी है पनगढिय़ा
बता तें अरविंद पनगढिय़ा अर्थशास्त्र के सिद्धस्थ अनुभवी विद्वान है। वे कोलंबिया यूनिवर्सिटी में इंडियन पॉलिटिकल इकोनॉमी पढ़ाते थे। इससे पहले वे एशियाई विकास बैंक में मुख्य अर्थशास्त्री भी रह चुके हैं। वहीं मेरीलैंड यूनिवर्सिटी के कॉलेज पार्क में इकोनॉमिक्स प्रोफेसर के तौर पर सेवा दे चुके हैं तो वल्र्ड बैंक, आईएमएफ और यूएनसीटीएडी सरीखे महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए काम कर चुके हैं। मार्च 2012 में उन्हें पदम विभूषण से सम्मानित किया गया। उन्होंने इंडिया द इमरजिंग जाइंट पुस्तक लिखी। जो 2008 में अर्थशास्त्र की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली पुस्तक में शुमार है।

-नीति आयोग का सौंपा था जिम्मा
देश में पीएम मोदी की सरकार बनने पर योजना आयोग को खत्म कर जब नीति आयोग का गठन किया गया। उस समय पीएम मोदी ने खुद अरविंद पनगढिय़ा को इसका पहला उपाध्यक्ष बनाया। लेकिन अध्यापन कार्य के प्रति उनका मन सदा से विचलित ही होता रहा है। ऐसे में अपनी इस लगाव के चलते ही उन्होंने अंर्तात्मा की आवाज पर यह निर्णय लिया।

LEAVE A REPLY