Padmavati

कुलदीप शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)                                                                                             जयपुर। मैं ना कोई इतिहासवेत्ता हूँ ना ही संस्कृति का ज्ञाता.. एक सामान्य व्यक्ति हूँ, पत्रकारिता मेरा कर्म रहा है । बचपन से ना जाने क्यों.. मेरे भीतर एक लौ कौंधती है कि मेरा सौभाग्य है कि मैंने राजस्थान की शौर्य, बलिदानी माटी में जन्म लिया है । काल, परिस्थितियों ने मेवाड़ की अनन्य यात्राओं का अवसर दिया और हमारी शौर्य व बलिदानी संस्कृति के सिरमौर मुकुट चित्तौड़गढ़ दुर्ग में मत्था टेकने के भी कई मौके मिले । यूं तो मेवाड़ का चप्पा -चप्पा मुझे खींचता है, हल्दीघाटी, कुंभलगढ़, गोगुंदा, चावंड, उबेश्वर, दिवेर जहाँ प्रताप के महान संघर्ष की याद दिलाते हैं, वहीं एकलिंगजी, श्रीनाथजी,चारभुजा जैसे स्थान भी प्रेरित करते हैं । लेकिन चित्तौडगढ़ सबसे बढ़कर है, जहाँ मीरां की कृष्ण भक्ति की अनुगूँज है, राणा सांगा का प्रण है, हम्मीर का संकल्प है, पन्नाधाय का त्याग है, जयमल का बलिदान है, मेड़तिया राठौड़ों के ‘ अठै कि उठै ‘ जैसे प्राणोत्सर्ग के हठ हैं । राणा कुंभा का शिल्प है तो जौहर व शाकों की आन हैं । यहीं से योद्धा प्रस्थान कर ‘ गाड़िया लुहार ‘ बन गए लेकिन सदियों से अपना वचन निभा रहे हैं ।

ऐसी ही आन-बान के लिए सदियों पहले रानी पद्मिनी ने हजारों क्षत्राणियों के साथ जौहर किया था और योद्धा केसरिया बाना पहन ‘ शाका ‘ करने दुर्ग से उतर पड़े थे । कोई संजयलीला भंसाली इस आंच को नहीं समझ सकता… यह आंच कोई क्रांतिकारी गणेशशंकर विघार्थी ही समझ सकता है, जिन्होंने अपने अखबार का नाम ‘ प्रताप ‘ रखा । आज प्रगतिशीलता, कला- संस्कृति की स्वतंत्रता के नाम पर भंसाली और उनकी फिल्म के साथ कई लोग खड़े हो रहे हैं… लेकिन समाज अपनी संस्कृति के साथ भी खड़ा है.. और उसे खड़ा होना चाहिए क्योंकि ‘जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध । ‘ क्या भंसाली राजस्थान की शिराओं में दैदीप्यमान पृथ्वीराज चौहान के पराक्रम, हाड़ी रानी के त्याग, वीर हम्मीर चौहान के हठ, वीर दुर्गादास व वीर अमर सिंह राठौड़ के शौर्य, राव शेखा के तेजस्व और सवाई जयसिंह के ओजस्व, राजा सूरजमल के साहस व राणा पूंजा के संघर्ष के बारे में जानते हैं, जो वे इस प्रदेश का इतिहास बदलने चले हैं ।

रानी पद्मिनी सिर्फ चित्तौड़ की रानी नहीं थी, वह चित्तौड़ व मेवाड़ के एक हजार वर्ष लंबे उस रूधिर यज्ञ की प्रवर्तक थीं, जो इस राष्ट्र की शिराओं में संदेश बनकर दौड़ता है । यह किसी राजपूत रानी का प्रश्न नहीं है, राजस्थान का भी प्रश्न नहीं है, यह हमारी भारतीय संस्कृति व इतिहास की प्रतिष्ठा का प्रश्न है। जो लाखों शीश सदियों तक मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए कटे हैं.. उन शहीदों के सम्मान का प्रश्न है, चाहे यह शहादत खानवा के युद्ध उपरांत राणा सांगा की हो या हल्दीघाटी में हकीम खान सूरी व झाला मान जैसे असंख्य वीरों की । यह प्रश्न आज के भारतीय समाज की आस्था का भी है, जो चित्तौड़ या हल्दीघाटी में सिर्फ घूमने नहीं जाता । यह समाज राणा प्रताप, गोरा -बादल, मीरां, पन्नाधाय, रानी पद्मिनी की कथाएं पढ़ अपने स्वाभिमानी चरित्र व संस्कार का निर्माण करता है । इन कथाओं का विश्वास उसे वहाँ ले जाता है, इसलिए कोटि -कोटि भारतीय समाज के विश्वास व आस्था का मान रखते हुए संजय लीला भंसाली अपनी विवादित फिल्म को वापस ले और समूची केंद्र सरकार, हमारी संसद, जागरूक मीडिया व राजनीतिक दलों के साथ इस प्रदेश के सपूत केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री जैसे सभी मंच व स्वर निर्धारित करें कि हम हमारी संस्कृति व इतिहास को कहाँ तक रक्षित और परिभाषित करने के लिए संकल्पित हैं । इस राष्ट्र के इतिहास को वैसे ही बहुत हानि पहुंच चुकी है… रानी पद्मिनी जैसे कुछ प्रतीकों को तो हम बख्श दें ।

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