• राकेश कुमार शर्मा 

जयपुर। आप सभी को 2008 में राजस्थान विधानसभा के चुनाव याद होंगे। चुनाव से पहले भाजपा के कद्दावर नेता डॉ. किरोड़ी लाल मीना को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। तब जाट नेता विश्वेन्द्र सिंह ने कांग्रेस का दामन थाम लिया था। कई दूसरे नेता भी पार्टी को छोड़कर चले गए थे। किरोडी लाल मीना व उनके समर्थकों ने निर्दलीय चुनाव लड़ा। वे जीते भी। कुल मिलाकर चुनाव से पहले भाजपा के पक्ष में ऐसा नकारात्मक माहौल बना कि पार्टी को चुनाव में मुंह की खानी पड़ी। कांग्रेस ने निर्दलीयों का साथ लेकर सत्ता में वापसी की थी। वर्ष 2008 से पहले का माहौल जो डॉ.किरोडी लाल मीना ने पार्टी में रहते हुए और फिर पार्टी से बाहर रहते हुए पूरे प्रदेश में भाजपा के खिलाफ किया, कुछ उसी तरह के राजनीतिक बदलाव और माहौल के संकेत फिर से दिखाई दे रहे हैं। तब मीना ने तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ बगावती झण्डा बुलंद कर रखा था, तब उन्हें पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का साथ मिला था। ऐसा ही कुछ पार्टी के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री घनश्याम तिवाड़ी कर रहे हैं। जब से प्रदेश में भाजपा सत्ता में आई है और वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री बनीं है, तब से तिवाड़ी उनके खिलाफ मुखर हैं। चुनाव से पहले भी उन्होंने घोषणा कर दी थी कि वे वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री बनने पर उनके मंत्रिमण्डल में शामिल नहीं होंगे। वे अपने इस वादे पर कायम भी रहे। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर तिवाड़ी ने मुख्यमंत्री राजे व पार्टी नेतृत्व के खिलाफ हमले करते रहे हैं। प्रदेश की संपदा को बेचने, शासन में लूटखोरी, भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी, भाई-भतीजावाद, सामंतशाही जैसे आरोप लगाकर वे सरकार और पार्टी को घेरते रहे हैं। इसी मुखरता और तीखे तेवरों के चलते पार्टी कई बार उन्हें चेताती भी रही है। लेकिन वे नहीं माने। राजस्थान भाजपा इकाई की शिखायत पर अब भाजपा की केन्द्रीय अनुशासन समिति ने घनश्याम तिवाड़ी को नोटिस दिया है, जिसमें कहा है कि वे लगातार सरकार और पार्टी विरोधी बयान दे रहे हैं और पार्टी-सरकार की छवि खराब कर रहे हैं। नोटिस देकर पार्टी ने तिवाड़ी से जवाब मांगा है।
नोटिस मिलने के बाद तिवाड़ी भी कह रहे हैं कि फिलहाल तो कोई नोटिस नहीं मिला। नोटिस मिलने पर माकूल जवाब भी दिया जाएगा। तिवाड़ी ने मुख्यमंत्री का नाम लिए बिना कहा कि प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी अपने आका के इशारे पर उन्हें पार्टी से निकालना चाहते हैं, लेकिन वे किसी से डरते नहीं है। सत्तालोभी, भ्रष्ट और सामंतशाही विचारों के खिलाफ जंग लड़ते रहेंगे। घनश्याम तिवाड़ी को नोटिस मिलने और तिवाड़ी के तीखे तेवरों से लगता है कि ना तो पार्टी तिवाड़ी को छोडऩे के मूड में है और ना ही तिवाड़ी पीछे हटने को राजी है। वे कह भी चुके हैं कि दिल्ली में एक नेता ने उन्हें एडजस्ट होने पर सेटलमेंट कराने की कही, लेकिन वे नहीं मानें। इससे साफ है कि वे मैदान से हटने को तैयार नहीं है। पूर्ववर्ती बयानों की तरह वे आर-पार की लड़ाई लडऩे के मूड़ में है। अगर ऐसा होता है कि भाजपा फिर से उस इतिहास को दोहराएगी, जो वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव से पहले हुआ था। तब किरोडी लाल मीना ने भाजपा सरकार के खिलाफ झण्ड़ा बुलंद किया था और उसकी कीमत भाजपा को सत्ता से बाहर होने पर मिली थी। कुछ ऐसे ही तेवर तिवाड़ी के दिख रहे हैं। वे भी पार्टी के कोई एक्शन लेने पर राजनीतिक जंग को तैयार है। जिस तरह से सांगानेर के प्रशिक्षण शिविर में उन पर हमला हुआ, उससे उन्हें लगता है कि पार्टी ऐनवक्त पर उनके टिकट पर रोडा अटका सकती है। इसे देखते हुए तिवाड़ी ने दो साल पहले से ही अपनी राजनीतिक मजबूती के लिए तैयारियां शुरु कर दी थी। अंदरखाने पार्टी कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग उन्हें समर्थन भी देता आ रहा है। उनके सम्मेलनों में उमडऩे वाले कार्यकर्ताओं व नेताओं की भीड़ इसके संकेत है। पार्टी का एक बड़ा तबका मानता है कि सरकार भले ही भाजपा की हो, लेकिन कार्यकर्ताओं की कोई पूछ नहीं है। जनता भी शासन से खुश नहीं है। पार्टी और सरकार में यसमैन को बढ़ावा दिया जा रहा है और संघनिष्ठ व जनाधार वाले कार्यकर्ताओं को नजर अंदाज किया जा रहा है। ऐसे कार्यकर्ता घनश्याम तिवाड़ी को पसंद कर रहे हैं, जो खुले तौर पर कार्यकर्ताओं की अनदेखी और सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे हैं। वैसे भी राजस्थान की राजनीति में सीएम वसुंधरा राजे के पूरे दखल को देखते हुए लगता है कि घनश्याम तिवाड़ी व दूसरे वरिष्ठ नेताओं (नरतप सिंह राजवी, देवी सिंह भाटी) को सम्मानजनक स्थान पार्टी व सरकार में नहीं मिल पाएगा। ऐसे में पार्टी ने तिवाड़ी को निष्कासित करना पड़ा तो तिवाड़ी भी चुनावी जंग में कूद सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो वे ही हालात बनेंगे, जो 2008 के विधानसभा चुनाव से पहले बने थे। भाजपा के अच्छे कार्यक्रमों व नीतियों के बावजूद किरोडी लाल मीना, विश्वेन्द्र सिंह की बगावत और वसुंधरा राजे के विरोधी खेमे की बयानबाजी से ऐसा नकारात्मक माहौल खड़ा हुआ, जिससे पार्टी को खासा नुकसान हुआ। पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। घनश्याम तिवाड़ी एक अनुभवी राजनीतिक हैं। चालीस साल से राजनीति में है और हर समाज-तबके और क्षेत्र में उनकी पकड़ है। खासकर सवर्ण जातियों में। सवर्ण जातियों का वोटबैंक ही भाजपा का मुख्य आधार रहा है। तिवाड़ी इसे बखूवी समझते भी हैं। भाजपा के खिलाफ चुनावी जंग में खड़े होने पर वे इस वोटबैंक के सहारे जवाबी हमले करेंगे। पार्टी और सरकार भी जानती है कि घनश्याम तिवाड़ी का अपना जनाधार है और वे नाराज भी है। अगर पार्टी से निकाला तो वे भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे। इसका खामियाजा पार्टी को उठाना पड़ सकता है। यह भी चर्चा है कि तिवाड़ी की सरकार विरोधी बयानबाजी पर रोक लगाने और काबू में रखने के लिए नोटिस दिया है। अगर इसके बाद भी वे नहीं रुके तो पार्टी कड़ा एक्शन ले सकती हैं। ऐसा हुआ तो घनश्याम तिवाड़ी भी किरोड़ी लाल मीना की राह पर चल सकते हैं। तिवाड़ी ही नहीं पार्टी के कई ऐसे नेता भी उनके साथ हो सकते हैं, जो अभी सरकार व पार्टी से नाखुश है।
– हर विधानसभा में तैयार हो रहे हैं चन्द्रगुप्त
घनश्याम तिवाड़ी ने भाजपा सरकार पर हमला बोलते हुए कहा था कि जिस तरह से चाणक्य ने चन्द्रगुप्त की मदद से मगध से भ्रष्ट व क्रूर नंदवंश को उखाड़ फैंका था, वैसे ही इस भ्रष्ट और सामंतशाही सरकार को उखाड़ फैंकने के लिए पूरे प्रदेश में चन्द्रगुप्त किए जा रहे हैं। हर विधानसभा में एक चन्द्रगुप्त तैयार किया जाएगा। इसी के तहत तिवाड़ी ने अपने तीन दशक पुराने संगठन दीनदयाल वाहिनी के सहारे पूरे राजस्थान में एक अलग मुहिम चला रखी है। जिला से बूथ स्तर पर इकाई गठित की जा रही है। वाहिनी के बैनर तले प्रदेश, जिला व बूथ स्तर पर सम्मेलन हो रहे हैं। तिवाड़ी को लगता है कि पार्टी उनके साथ भी वो रवैया अपना सकती हैं, जैसा किरोड़ी लाल मीना के साथ किया था। ऐसे में उन्होंने अपने गैर राजनीतिक संगठन दीनदयाल वाहिनी के मार्फत प्रदेश में अपनी सामाजिक व राजनीतिक पकड़ मजबूत बनाने में लगे हुए हैं। एक हद तक वे सफल भी रहे हैं। हर जिले में उन्हें भरपूर समर्थन मिल रहा है, खासकर सवर्ण जातियों के जिलों में। वे सवर्णों को चौदह फीसदी आरक्षण की वकालत भी कर रहे हैं। इसमें कोई संदेह भी नहीं है कि तिवाड़ी की ब्राह्मण समाज के साथ अन्य समाजों में भी अच्छी पकड़ है।

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