Kashmir, problem, inefficient policy, previous, governments, Dr. Alok Bharadwaj, Political Analyst, bjp
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डाक्टर आलोक भारद्वाज

श्मीर में केंद्र की ओर से लागू किये गये सशर्त एकतरफा युद्धविराम के फैसले के बावजूद जम्मू-कश्मीर में हिंसा की घटनाओं में कोई कमी नहीं आयी है। पिछले कुछ महीनों में सुरक्षा बलों ने महत्वपूर्ण कार्रवाई की थी और अंतर्राष्ट्रीय

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सीमा और कश्मीर के भीतर दोनों ही जगहों पर पैदा हुए खतरे को बेअसर कर दिया था। लेकिनआतंकवादियों ने युद्धविराम को कश्मीर में सुरक्षा बलों के खिलाफ एक बार फिर से संगठित होने और रणनीतिक रूप से निशाना बनाने के अवसर के रूप में देखा। आतंकवादियों ने बार बार अपनी गतिविधियों से दर्शाया है कि उन्हें शांति की भाषा समझ नहीं आती है। घाटी में शांति बहाल तभी हो सकती है जब चरमपंथी तत्व को खत्म किया जायेगा या शांति बहाल के लिए पारस्परिकता होगी। अलगाव और जिहादी मानसिकता वाले इन घुसपैठियों और आतंकवादियों पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता है कि वो कश्मीर में कभी शांति को बने रहने देंगे।

पाक अधिकृत कश्मीर के हालात : पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का कुल क्षेत्रफल करीब 13 हजार वर्ग किलोमीटर (भारतीय कश्मीर से 3 गुना बड़ा) है, जहां करीब 30 लाख लोग रहते है।पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अक्साई चिन शामिल नहीं है। यह इलाका महाराजा हरिसिंह के समय में कश्मीर का हिस्सा था। 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध के बाद कश्मीर के उत्तर-पूर्व में चीन से सटे इलाके अक्साई चिन पर चीन का कब्जा है। पाकिस्तान ने चीन के इस कब्जे को मान्यता दी है। जम्मू-कश्मीर और अक्साई चिन को अलग करने वाली रेखा को लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा कहा जाता है।

-नेहरू और हरिसिंह की गलती का खामियाजा भारत भोग रहा है।

1947 में पाकिस्तान के पख्तून कबाइलियों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला बोल दिया जिसके बाद जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरिसिंह ने भारतीय सरकार के साथ एक समझौता किया जिसके तहत भारत सरकार से सैन्य सहायता मांगी गई और इसके बदले में जम्मू-कश्मीर को भारत में मिलाने की बात कही गई। भारत ने इस समझौते पर दस्तखत कर दिए। उस समय पाकिस्तान से हुई लड़ाई के बाद कश्मीर 2 हिस्सों में बंट गया। कश्मीर का जो हिस्सा भारत से लगा हुआ था, वह जम्मू-कश्मीर नाम से भारत का एक सूबा हो गया, वहीं कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान और अफगानिस्तान से सटा हुआ था, वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहलाया।
पीओके को लेकरपाकिस्तान की दोहरी नीति है। एक तरफ तो वह इसे आजाद कश्मीर कहता है तो दूसरी ओर यहां के प्रशासन और राजनीति में सीधा दखल कर यहां के सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़ने में लगा है। यह तथ्य दुनिया से छुपा नहीं है कि पाकिस्नान ने पाक अधिकृत कश्मीर को भारतीय कश्‍मीर और चीन के जिंगजियांग में आतंकवादी फैलाने के लिए एक ट्रेनिंग सेंटर बना दिया है, लेकिन अब चीन की गतिविधियां बढ़ने के कारण उसने ‍अपना फोकस पूर्णत: कश्मीर पर कर दिया है। जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में एक बार उमर अब्दुल्ला ने ताजा जानकारी दी थी कि पाक अधिकृत कश्मीर में अब भी करीब 4,000 कश्मीरी ट्रेनिंग ले रहे हैं। उन्होंने विधायक प्रोफेसर चमनलाल गुप्ता के प्रश्न के लिखित जवाब में विधानसभा में कहा ‍था कि पीओके और पाकिस्तान में कथित रूप से अब भी करीब 3,974 आतंकवादी घुसपैठ की तैयारी कर रहे हैं।

दुर्भाग्य से हालिया समय में पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों को भी जातीय संघर्ष, आतंकवाद और पाकिस्तान की कब्जा करने वाली नीतियों के कारण आर्थिक और सामाजिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा रहा है। अब एक और समस्या का सामना पाक अधिकृत कश्मीरियों को करना पड़ रहा है। विकास के नाम पर या विकास संबंधी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के नाम पर उसने चीन को अंदर घुसा लिया है। चीन की पीओके में उपस्थिति से भारत को चिंतित होने की जरूरत नहीं। क्योकिं चीन के ‍शिनजियांग प्रांत में आतंकवादी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इस घटना को अंजाम दे रहा है ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम)। इसको अप्रत्यक्ष रूप से सपोर्ट करने वाले हैं पाकिस्तान के कई आतंकवादी संगठन। चीन यह अच्छी तरह जानता है। ईटीआईएम के सरगनाओं ने पीओके और पाकिस्तान के कबायली इलाकों की सुरक्षित पनाहगाहों में शरण ले रखी है। कश्मीरियों के प्रति पाकिस्तान के दिखावे की पोल तो उस वक्त ही खुल गई थी, जब उसने कश्मीरियों को प्रताड़ित कर भगाना शुरू कर दिया था। गिलगित और बाल्टिस्तान में लोकतांत्रिक अधिकारों और स्वायत्तता की मांग को लेकर शिया मुसलमानों के आंदोलन को बर्बरता से कुचला गया था। सच तो यह है कि पाक अधिकृतकश्मीर में अब कुछ ही कश्मीरी रहते हैं उनमें से भी ज्यादातर वो सुन्नी मुसलमान है जिन्होंने शियाओं और पंडितों को वहां से भगा दिया है, लेकिन अब वे भी जहालत की जिंदगी ‍जी रहे हैं। वहां बचे इन सुन्नियों का एकमात्र काम बचा है हाफिज सईद के लिए काम करना। पाक अधिकृत कश्मीरके गिलगिट और बाल्टिस्तान में लोग भूख और अभावों से जूझ रहे हैं। वहां बस आतंक का राज है।

27 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय होने के बावजूद तत्कालीन जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार आततायी कबीलों से उनकी रक्षा नहीं कर सकी। “वर्तमान की ज्वलंत कश्मीर समस्या नेहरू सरकार की इसी नाकामी की देन कही जा सकती है।”
12 अगस्त 2016 , प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग है। वह जम्मू-कश्मीर के चार हिस्सों: जम्मू,कश्मीर घाटी, लद्दाख और पीओके में शामिल है और बातचीत में इन सभी को शामिल करना होगा। खास बात यह है कि 22 अक्टूबर 1947 से भारत के प्रधानमंत्री को इस बात को कहने के लिए इतने साल लग गए। पहली बार भारत ने कश्मीर मुद्दे पर दिए जाने वाले अपने बयान में मूलभूत बदलाव किया है। भारत सरकार ने पहली बार कश्मीर मुद्दे पर रक्षात्मक होने की बजाय आक्रामक शैली अपनाई है।
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने कश्मीर मुद्दे पर पाक को स्पष्ट रूप से यह सन्देश दे दिया है कि अब बात केवल पाक अधिकृत कश्मीर पर एवं घाटी में पाक द्वारा प्रायोजित हिंसा पर ही होगी, साथ ही बलूचिस्तान एवं पीओके में रहने वाले लोगों की दयनीय स्थिति एवं वहां होने वाले मानव अधिकारों के हनन के मुद्दे को भी नरेंद्र मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठा कर न सिर्फ भारतीय राजनीति में बल्कि पाक एवं वैश्विक स्तर पर भी राजनैतिक परिदृश्य बदल दिया है।
यूनाइटेड नेशनल जनरल एसेम्बली में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से कहा था कि मुद्दा “पीओके” है न कि जम्मू-कश्मीर। कश्मीर हमारे देश की जन्नत है, भारत का ताज है और हमेशा रहेगा। दरअसल, सवाल यह है कि क्यों आज तक पूर्ववर्ती सरकारों ने कभी अपने ताज के उस हिस्से के बारे में आवाज उठाने की कोशिश नहीं की जो पाकिस्तान के कब्जे में है?

हमारे अपने ही देश से कश्मीर में मानव अधिकार हनन का मुद्दा कई बार उठा है, लेकिन क्या कभी एक बार भी राष्ट्रीय अथवा अन्तराष्ट्रीय स्तर पर पाक अधिकृत कश्मीर में मानव अधिकारों के हनन पर चर्चा हुई है? इसे पूर्ववती भारतीय सरकारों की असफलता ही कहा जा सकता है कि पाक द्वारा लगातार प्रायोजित आतंकवाद , सीमा पर गोली बारी और घुसपैठ के कारण कश्मीर में होने वाली मासूमों की मौतों के बावजूद अन्तराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर एक मुद्दा है, लेकिन पीओके पर किसी का कोई बयान नहीं आया था, उसकी कोई चर्चा नहीं होती थी ।
देखा जाए तो, कश्मीर समस्या की जड़ को समझें तो शुरुआत से ही यह एक राजनैतिक समस्या रही है, जिसे पंडित नेहरू ने यूएन में ले जाकर एक अन्तराष्ट्रीय समस्या में तब्दील कर दिया था। यह एक राजनैतिक उद्देश्य से प्रायोजित समस्या है जिसका हल केवल राजनीति कूटनीति और दूरदर्शिता से ही निकलेगा।
कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने हाल ही में स्वीकार किया है कि कुल दो प्रतिशत लोग हैं, जो कश्मीर की आज़ादी की मांग करते हैं और अस्थिरता फैलाते हैं, जबकि वहां का आम आदमी शांति चाहता है, रोजगार चाहता है, तरक्की चाहता है और अपने बच्चों के लिए एक सुनहरा भविष्य चाहता है।
कश्मीरी नागरिक अरीफ शहीद द्वारा उर्दू में लिखी उनकी पुस्तक “कौन आज़ाद कौन ग़ुलाम” में उन्होंने तथाकथित आज़ाद कश्मीरियों के दर्द को बखूबी प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार भारत में रहने वाले कश्मीरी आर्थिक एवं राजनैतिक रूप से उसी प्रकार आज़ाद हैं, जैसे भारत के किसी अन्य राज्य के लोग, किन्तु पाक अधिकृत कश्मीर में आने वाले गिलगित और बाल्टिस्तान के लोगों की स्थिति बेहद दयनीय हैं।
पाकिस्तान द्वारा अन्तराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की मांग उठाई जाती रही है। उसकी इस मांग पर अखबारों एवं टीवी चैनलों पर अनेकों वाद विवाद हुए, लेकिन यह भारतीय मीडिया एवं अब तक की सरकारों की अकर्मण्यता ही है कि आज तक 13 अगस्त 1948 के उस यूएन रिज्‍योल्यूशन का पूरा सच देश के सामने नहीं रखा गया कि किसी भी प्रकार के जनमत संग्रह के बारे में ‘सोचने ‘ से भी पहले पाकिस्तान को कश्मीर के उस हिस्से को खाली करना होगा।

यह सर्वविदित है कि कश्मीर मुद्दा पाक नेतृत्व के लिए संजीवनी बूटी का काम करता है। इसी मुद्दे के सहारे वे सरकारें बनाते हैं, और इसी के सहारे अपनी नाकामयाबी से वहां की जनता का ध्यान हटाते हैं, कश्मीर समस्या का हल पाक कभी चाहेगा नहीं, अत: इस समस्या का समाधान तो भारत को ही निकालना होगा।
कश्मीर का राजनैतिक लाभ तो अब तक बहुत उठा लिया गया है, अब समय है राजनैतिक हल निकाल कर अपने ताज के टूटे हुए हिस्से को वापस लाने का। और यकीनन बधाइयां हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को, जिन्‍होंने कश्‍मीर पर एक ऐसा स्‍टैंड लिया है, जो भारत के इतिहास में कभी नहीं लिया गया और जिसकी पूरे देश में ही नहीं बल्‍कि विश्‍व में चर्चा हो रही है।
जो भी हो, भारत के लिए कश्मीर जीवन-मरण तथा राष्ट्र-प्रतिष्ठा का विषय बन गया है । कश्मीर वस्तुत: भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंध की कड़ी है । रूस और चीन की सीमाएँ उसके आस-पास हैं । भारत में बहनेवाली नदियों का मूल कश्मीर में है । वह भारत की धर्मनिरपेक्षता की नीति की कसौटी है । अत: हम भारतीय किसी भी मूल्य पर कश्मीर का एक इंच भूभाग भी छोड़ने को तैयार नहीं है । और हम भारतीय यह उम्मीद कर सकते हैं कि वर्तमान सरकार इस कश्मीर समस्या के पूर्ण समाधान हेतु उचित कदम आवश्यक उठाएगी।

-डाक्टर आलोक भारद्वाज
राजनीतिक विश्लेषक

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