जयपुर। राजस्थान का दिल कहलाने वाली अजमेर नगरी के दामन पर एक बदनुमा दाग के तौर पर लगे बहुचर्चित ब्लैकमेल कांड में एक नया पेंच आ गया है। यह पेंच खुद रेप पीडि़ताओं के मामले में उभरकर सामने आया है। जहां 25 साल बाद अब पीडि़ताओं को गवाही के लिए तलब किया जा रहा है। लेकिन पीडि़ताओं के एक अजीब से धर्मसंकट में फंसे होने से गवाही के लिए आना संभव होता नजर नहीं आ रहा है।

वर्ष 1992 में सामने आए इस मामले में मुख्य अभियुक्त नफीस चिश्ती हालांकि अभी जेल में है। फिर भी पीडि़ताओं के गवाही के लिए आना अब चुनौती ही बना हुआ है। इसके पीछे कारण यह भी उभरकर सामने आया है कि जिस समय मुकदमा दर्ज हुआ, उस दौर में परिस्थितियां अलग थीं और आज की परिस्थितियां अलग है। आज इन पीडि़ताओं के हंसते खेलते परिवार हैं तो कुछ के बच्चों की शादियां भी हो गई हैं। ऐसे में अब उम्र के इस पड़ाव में अपने साथ हुई ज्यादतियों की गवाही देने के लिए आना उनके लिए पसोपेश भरा ही साबित हो रहा है। इस प्रकरण में अब तक 70 गवाहों के बयान हो चुके हैं। जबकि पीडि़ताओं के गवाही बाकी है। इस प्रकरण में अब एक सिंतबर को सुनवाई होनी है।

-पते के अभाव में सम्मन तामिल नहीं
25 साल पुराने इस मामले में अब हालात बदले हुए ही नजर आ रहे हैं। पुलिस की माने तो मुकदमें में जो पते दर्ज हैं, उस जगह पीडि़ताएं अब रहती नहीं है। पता नहीं मिल पाने के कारण उनकी गवाही के लिए सम्मन तामिल नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में इन परिस्थितियों के चलते आरोपियों को सीधे सीधे लाभ मिलता नजर आ रहा है।

-मुख्य आरोपी गिरफ्तार, दो अभी भी फरार
वर्ष 1992 में दर्ज हुए इस प्रकरण में तीसरी मर्तबा सुनवाई हो रही है। हालांकि इससे पहले 1998 में मूल मुकदमे में फैसला आ गया था। उस समय कोर्ट में पीडि़ताओं ने आरोपियों के खिलाफ गवाही दी तो कोर्ट ने 8 आरोपियों को उम्र कैद की सजा सुनाई थी, जो बाद में 10 साल कैद की सजा में तब्दील हो गई। मामले में एक आरोपी फारुख चिश्ती के खिलाफ उस समय मुकदमा इस आधार पर नहीं चल पाया था कि वह सिजोफ्रोनिया नामक मानसिक बीमारी से ग्रस्त है। वह ठीक हुआ तो उसके खिलाफ अलग से सुनवाई हुई और उसे भी दोषी ठहराते हुए सजा दी गई। इसी बीच वर्ष 2003 में मुख्य आरोपी नफीस चिश्ती दिल्ली में पुलिस के हत्थे चढ़ गया। इसके बाद 2010 में नसीम उर्फ टार्जन और इकबाल भाटी भी पकड़े गए। सलीम चिश्ती की 2012 में गिरफ्तारी हुई। नफीस सहित पांच के खिलाफ मुकदमा लंबित है। इसी तरह मामले के मुल्जिम अल्मास महाराज और सोहेल गनी अभी भी फरार ही हैं। ऐसे में अब सारी परिस्थितियों के मद्देनजर इनके खिलाफ गवाही देने के लिए आना उनके लिए पसोपेश भरा ही साबित हो रहा है।

-सेक्स स्कैंडल का भांडा फूटा था
बता दें वर्ष 1992 में इस पूरे स्कैंडल का भांडा फूटा था, पीडि़ताएं कॉलेज व स्कूल में पढ़ती थी। तब पीडि़त युवतियों के बयान व अन्य सबूतों के आधार पर करीब 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। इसमें एक आरोपी पुरुषोत्तम ने 1994 में जमानत पर छूटने के बाद आत्महत्या कर ली थी। मामले में पहला फैसला 1998 में आया। उस समय तत्कालीन जिला जज कन्हैयालाल व्यास ने 8 आरोपियों को उम्र कैद से दंडित किया।

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