-ललित गर्ग-

शांति, लोकतंत्र-व्यवस्था और सतत विकास प्राप्त करने के लिए सहनशीलता एक आवश्यक शर्त है। इंसान विशेषतः युवा पीढ़ी में जल्द उत्तेजित हो जाने की समस्या तेजी से बढ़ रही है। ‘गर्म खून’ और ‘लड़कपन’ कह कर युवाओं में बढ़ रही इस दुष्प्रवृत्ति को हम नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन जल्द उत्तेजित होने वाले ये लोग खुद के साथ-साथ दूसरे को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। न केवल युवापीढ़ी बल्कि आज की नेतृत्व शक्तियां भी असहनशील होती जा रही है। लम्बे समय से चल रहा रूस-यूक्रेन युद्ध इसी असहनशीलता का परिणाम है। दरअसल राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं, बदलते लाइफस्टाइल और सामाजिक माहौल की वजह से लोगों के अंदर सहनशीलता लगातार घटती जा रही है। सामाजिक माहौल ना बिगड़े और दुनिया के लोग एक दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहें, इसी संकल्प के साथ अंतरराष्ट्रीय सहनशीलता दिवस मनाया जाता है। 1995 में महात्मा गांधी की 125वीं जयंती पर संयुक्त राष्ट्र ने सहनशीलता वर्ष मनाया था। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1996 में औपचारिक तौर पर प्रस्ताव पास कर अंतरराष्ट्रीय सहनशीलता दिवस की शुरुआत की थी।
सहनशीलता दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों हुई? क्योंकि आज आदमी के दिल-दिमाग पर खींची अलगाव और दुराव की रेखाएं उसी के वक्षस्थल पर आरियां चला रही हैं। आतंक की दहशत में सिसकता जीवन नई संजीवनी की अपेक्षा में दिन काट रहा है। अबाध गति से प्रवहमान जीवन की धारा अवरुद्ध सी हो गई है। धन, जमीन और धातु के टुकड़ों से अपने बड़प्पन को प्रदर्शित करने वाला व्यक्ति यह भूलता जा रहा है कि जीवन की सफलता और सार्थकता इन चंादी के टुकड़ों से कभी भी हासिल नहीं की जा सकती। जीवन की ऊर्जस्विता और कर्तव्य की चेतना प्रसुप्त क्यों हो गई है? हिंसा, आतंक और अलगाव की ये आड़ी-तिरछी रेखाएं जीवन रूपी हाशिये को नहीं बल्कि पूरे जीवन पृष्ठ की गरिमा को लील रही हैं। धन और शोहरत की उदग्र, आकांक्षा ने व्यक्ति की सोच को बौना बना दिया है। ओज, तेज और वर्चस्व का महास्रोत सूखता जा रहा है। इन ज्वलनशील परिस्थितियों ने जीवन लक्ष्य के मानकों को भी तहस-नहस कर दिया है। ऐसे नाजुक और गंभीर दौर में सहनशीलता को नई दिशाएं देनी होगी। जीवन की यथार्थ अनुभूति के लिए सहिष्णुता की प्रायोगिक चेतना को जन्म देना होगा। क्योंकि व्यक्ति, समाज, राष्ट्र एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई-झगड़ा एवं युद्ध की स्थितियां बनना आम हो गयी है।
टकराव, अलगाव, दुराव आदि तत्व जीवन के रस का शोषण कर रहे हैं। नीरस बना जीवन कदम-कदम पर कुंठा, निराशा और हीन भावना से ग्रस्त बनता जा रहा है। इन अवांछनीय तत्वों को हटाने के लिए कुछ करना होगा। कुछ करने का सोचें इससे पूर्व यह चिंतन करना अपेक्षित होगा कि ये परिस्थितियां इतनी बलवती कैसे बनी? कहीं हमने तो ही इन्हें आमंत्रित नहीं किया। निश्चित रूप से हमारे भीतर पलने वाली किसी एक कमजोरी ने इन सबके साथ सांठ-गांठ कर ली है। आज आम आदमी की सबसे बड़ी कमजोरी है- सहिष्णुता का अभाव। जब तक जीवन में सहिष्णुता का विकास का विकास नहीं किया जाएगा तब तक जीवन को गरिमामय एवं महिमामंडित भी नहीं किया जा सकेगा। बच्चों से लेकर बड़ों तक के जीवन से तिरोहित होने वाली इस सहिष्णुता ने कई समस्याओं को जन्म देकर जीवन को निस्तेज और रसहीन बना दिया है। फलतः बाता-बात में आवेश, आवेग और उत्तेजना के भाव पारिवारिक सामंजस्य, सौहार्द और परस्परता को विनष्ट करते हुए आतंक, अलगाव और दुराव को ही बढ़ावा दे रहे हैं। सहिष्णुता एक ऐसा सुरक्षा कवच है, जो परिस्थितियों के वात्याचक्र से व्यक्ति को अप्रभावित रख सकता है।
व्यक्ति अगर चाहे कि मेरे जीवन में सुख-शांति, समृद्धि, स्वस्थता, संतुलन और समरसता रहे तो सहनशील बनकर जीना होगा। यह सार्वभौम और सनातन तथ्य है और प्रत्येक व्यक्ति के लिए मंगलकारक है। सहिष्णुता की ओर उठा हर कदम अनगिन सफलताओं को प्राप्त करता हुआ आगे बढ़ता है। अव्यक्त को व्यक्त, अकल्पित को कल्पित और अघटित को घटित कर जीवन को संक्लेश से मुक्ति दिलवाता है। जिसने जीवन में सहन करना सीख लिया वह जिंदगी की हर जंग जीत सकता है। सहिष्णुता जीवन शक्ति का पर्याय है। विश्व के देशों में सहनशीलता का निरंतर क्षरण हो रहा है। शासक एक दूसरे के विरुद्ध ऐसे बयान जारी कर रहे हैं जिससे विश्व में कटुता और असहिष्णुता का बाजार गर्म हो रहा है। बात विश्व की ही नहीं, राष्ट्र एवं समाज की भी है, हर ओर छोटी-छोटी बातों पर उत्तेतना, आक्रोश, हिंसा के परिदृश्य व्याप्त है। विश्व सहनशीलता दिवस मनाने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि मानव समुदाय एक दूसरे का सम्मान करें और उन भावनाओं को पुष्ट करें जिससे किसी भी स्थिति में सहिष्णुता को हानि नहीं पहुंचे।
प्राचीन काल और मध्य युग में अहिंसा और सहिष्णुता पर जो किताब मनु, बुद्ध, महावीर और नानक ने लिखी उसी को नई इबारत में गांधीजी ने लिखा। किसी भी उद्देश्य के लिए किसी भी पक्ष द्वारा हिंसक मार्ग के अनुसरण को उन्होंने यह कह कर नकारा कि सात्विक दृष्टि से जब सब एक ही (परमात्मा) के अंश है, आस्था एक ही है तो फिर विद्वेष, प्रतिहिंसा और प्रतियोगिता क्यों? जिस समाज के पास वेदवाणी और गुरुवाणी से लेकर गांधी तक अहिंसावादी विचारों की धरोहर हो, वहां इतनी असहिष्णुता और इतनी हिंसा क्यों? एक बहुत झीनी, नाजुक और पतली-सी दीवार है सहिष्णुता, जिसके पीछे हिंसा, घृणा, वैर विरोध और प्रतिरोध जैसे विकार घात लगाए बैठे हैं। पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक या आर्थिक में से कोई भी कारण सहिष्णुता की नाजुक दीवार को गिराने के लिए काफी हो सकता है। किसी भी युग में किसी भी देश में जब-जब सहिष्णुता की दीवार में कोई सुराख करने की कोशिश हुई है, तब-तब आसुरी एवं हिंसक शक्तियों ने सामाजिक एकता को कमजोर किया है और विनाश का तांडव रचा है।
सहिष्णुता तभी कायम रह सकती है जब संवाद कायम रहे। सहिष्णुता इमारत है तो संवाद आधार। लेकिन प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावाद के जाल में फंस चुके इस विश्व में यह संवाद लगातार टूटता जा रहा है। हिंसात्मक विचार और विकार मन से शांति को उखाड़ कर ही अपना स्थान और सामान्य बनाते आए हैं। बुद्ध कहते हैं कि जिस समाज में ऐसी विपरीतगामी विचारधारा का (कु)शासन होता है, वह समाज तरक्की नहीं कर सकता और न ही उसमें सौहार्द कायम रह सकता है। असहिष्णुता शांति एवं सह-जीवन के लिये ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिये भी घातक है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि चिंता ‘चिता’ समान और क्रोध ‘विनाश’ की पहली सीढ़ी होता है। जल्दी उत्तेजित होने वाले जहां अन्य लोगों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वहीं, खुद की सेहत से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग उन्हें जकड़ रहे हैं। आजकल बिगड़ते खानपान और अनियमित दिनचर्या से लोगों में तनाव बढ़ रहा है। ऐसे में उनके अंदर सहनशीलता घट रही है और इसी वजह से वे रक्तचाप, हृदयरोग, डायबटीज जैसी गंभीर बीमारियों की चपेट में भी आ रहे हैं। बढ़ते मरीज और घटनाएं इसके प्रमाण हैं। अधिकांश घटनाओं के लिए नशा भी जिम्मेदार है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, सही शिक्षा के अभाव में नई पीढ़ी में मानसिक सहनशीलता कम हो रही है। संत कबीरदास से लेकर गुरुनानक, रैदास और सुन्दरलाल आदि संतों में समाज में सहिष्णुता का भाव उत्पन्न कर सामाजिक समरसता को जन-जन तक पहुंचाया। इससे समाज में सही अर्थों में सहिष्णुता की भावना बलवती हुई। संत कबीर हिन्दु-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। उन्होंने राम-रहीम को एक माना और कहा ईश्वर एक है भले ही उसके नाम अलग-अलग क्यों न हों। आजादी के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने सहिष्णुता का संदेश घर-घर तक पहुंचाया। गांधीजी सहिष्णुता के साक्षात प्रतीक थे। उन्होंने अनेक बार सहनशीलता का परिचय देकर भारतवासियों को एक नई राह दिखाई। सहनशीलता हमारे जीवन का मूल मंत्र है। सहिष्णुता ही लोकतंत्र का प्राण है और यही वसुधैव कुटुम्बकम, सर्वे भवन्तु सुखिनः एवं सर्वधर्म सद्भाव का आधार है। इसी से मानवता का अभ्युदय संभव है।

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