Bisalpur-Phulera

-जितेन्द्र शर्मा
जयपुर। भ्रष्टाचार में पीएचडी कर चुके जलदाय विभाग के इंजीनियर्स के कारनामे एक से बढ़कर एक हैं। इंजीनियर्स की कार्यशैली से लगता है कि वे भले ही तनख्वाह सरकार से ले रहे हैं, लेकिन जलदाय विभाग में वे काम ठेका कंपनियों के लिए कर रहे हैं। विभाग के इंजीनियर्स के इन एक से बढ़कर एक कारनामों में से एक कारनामा है बीसलपुर-दूदू पेयजल परियोजना से जुड़े क्षेत्रीय जलप्रदाय योजना फुलेरा कलस्टर का। 206.58 करोड़ लागत की इस पेयजल परियोजना में टाटा डक्ट्रा कंपनी के डीआई के-7 पाइप टेस्टिंग में फेल हो गए, फिर भी विभाग के इंजीनियर्स की मिलीभगत से इन घटिया पाइपों को पेयजल परियोजना में खपा दिया गया। मामले में टाटा कंपनी को बचाने और खुद को क्लीनचिट देने के लिए परियोजना से जुड़े इंजीनियर्स ने एक साल बाद प्राईवेट लैब में सैंपलों की जांच करवाकर उन्हें पास साबित करवा लिया। प्राईवेट लैब में एक साल बाद परियोजना से जुड़े इंजीनियर्स ने कौन से सैंपल जांच के लिए भेजे ये तो कंपनी और इंजीनियर्स ही जानते हैं, लेकिन उनकी यह कार्यशैली पूरी तरह से मिलीभगत साबित कर रही है। यह सवाल हम नहीं उठा रहे, बल्कि खुद विभाग की क्वालिटी कंट्रोल विंग ही उठा रही है।

दरअसल जलदाय विभाग की ओर से फुलेरा तहसील के 173 गांवों और दो कस्बों की पेयजल योजना के लिए 25 जुलाई, 2013 में मैसर्स प्रतिभा इण्डस्ट्रीज कंपनी को 206.58 करोड़ का कायार्देश जारी किया गया। फर्म की ओर से परियोजना में टाटा डक्ट्रा कंपनी के डीआई पाइप काम में लिए गए। जलदाय विभाग की क्वालिटी कंट्रोल विंग की ओर से परियोजना में काम में लिए जा रहे टाटा डक्टा कंपनी के 150 एमएम साइज के के-7 डीआई पाइप के सैंपल टेस्टिंग के लिए 15 अक्टूबर, 2015 को केन्द्र सरकार के उपभोक्ता मामलात विभाग की नेशनल टेस्ट हाउस लैब में भिजवाए गए। लैब में टेस्टिंग मापदण्डों में टाटा कंपनी के के-7 डीआई पाइप फेल हो गए। टाटा कंपनी के डीआई पाइप फेल होते ही जलदाय विभाग के परियोजना से जुड़े इंजीनियर्स की मिलीभगत का खेल शुरू हो गया। पहले तो विभाग के परियोजना इंजीनियर मामले को दबाते रहे, लेकिन टाटा कंपनी के डीआई पाइप फेल होने की भनक कई अन्य इंजीनियर्स को लग जाने और बीसलपुर-निवाई पेयजल परियोजना में जिंदल शॉ कंपनी के पाइप फेल होने का मामला विधानसभा में गूंजने के बाद अतिरिक्त मुख्य अभियंता परियोजना जयपुर की ओर से पाइपों की पुन: टेस्टिंग के लिए 4 मार्च, 2016 को एक कमेटी बना दी। कमेटी ने 1 अप्रेल, 2016 को टाटा कंपनी के डीआई पाइपों के दो सैंपल लिए और फिर 6 माह बाद उन्हें 26 अक्टूबर, 2016 को जांच के लिए दिल्ली की श्रीराम प्राईवेट लैब में जांच के लिए भेजे गए। श्रीराम लैब की जांच में टाटा कंपनी के डीआई के-7 पाइपों को मापदण्डों पर खरा बता दिया गया। लेकिन परियोजना से जुड़े इन इंजीनियर्स के मिलीभगत के खेल पर क्वालिटी कंट्रोल विंग ने ही सवाल खड़े कर दिए। क्वालिटी कंट्रोल विंग की ओर से परियोजना इंजीनियर्स से टेस्टिंग में किए गए फजीर्वाड़े को लेकर रिपोर्ट मांगी गई, लेकिन परियोजना से जुड़े इंजीनियर्स जवाब भेजने की बजाए इस पूरे खेल को दबाने में जुटे हुए हैं।

विधानसभा की प्राक्लन समिति को भी किया गुमराह
कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार में पूरी तरह से डूब चुके जलदाय विभाग के इंजीनियर अपनी लापरवाही और भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए विधानसभा की प्राक्लन समिति को भी गुमराह कर रहे हैं। अधूरे और झूठे जवाब भेजकर इंजीनियर्स और अधिकारी खुद को बचाने में लगे हुए हैं। प्रदेश की 32 हजार करोड़ की पेयजल परियोजनाओं में जलदाय विभाग इंजीनियर्स और अधिकारियों की मिलीभगत से हजारों करोड़ के घटिया पाइप खपा दिए गए। सरकार से मोटी तनख्वाह लेने वाले इन अधिकारी और इंजीनियर्स द्वारा अपने कमीशन के लालच में न केवल घटिया पाइप कंपनियों को बचाया जा रहा है, बल्कि प्रदेश के करोड़ों लोगों की प्यास से जुड़ी पेयजल योजनाओं की क्वालिटी पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

सैंपल लेने में परियोजना इंजीनियर्स की मिलीभगत
अतिरिक्त मुख्य अभियंता परियोजना जयपुर द्वारा टाटा कंपनी के डीआई के-7 पाइप की रि-टेस्टिंग के लिए 4 मार्च, 2016 को एक कमेटी बनाई। कमेटी द्वारा 1 अप्रेल, 2016 को टाटा कंपनी के 150 एमएम डीआई के-7 पाइप के दो सैंपल जांच के लिए उठाए गए। लेकिन उससे पहले ही परियोजना खण्ड सांभर अधिशाषी अभियंता द्वारा अपने पत्र क्रमांक 1995-97 से 29 मार्च, 2016 को ही सैंपल रि-टेस्टिंग के लिए नेशनल टेस्ट हाउस को भेजना बताया गया। जब अतिरिक्त मुख्य अभियंता परियोजना जयपुर द्वारा 4 मार्च, 2016 को कमेटी गठित कर दी थी तो फिर परियोजना खण्ड सांभर अधिशाषी अभियंता द्वारा 29 मार्च को ही सैंपल रि-टेस्टिंग के लिए क्यों भेजे गए। यह सारा खेल टाटा कंपनी के फेल डीआई पाइपों को खुर्दबुर्द करने के लिए किया गया था। क्वालिटी कंट्रोल विंग को आज तक इसका जवाब परियोजना अधिशाषी अभियंता द्वारा नहीं भेजा गया।

सैंपल लेने के 6 माह बाद क्यों कराई जांच?
बीसलपुर-फुलेरा परियोजना में टाटा डक्ट्र कंपनी के डीआई पाइप फेल होने के बाद अतिरिक्त मुख्य अभियंता परियोजना जयपुर की ओर ओर से पाइपों की रि-टेस्टिंग के लिए 4 मार्च, 2016 को कमेटी का गठन किया गया। कमेटी द्वारा 1 अप्रेल, 2016 को डीआई 150 एमएम के-7 पाइप के 2 सैंपल जांच के लिए लिए गए, लेकिन इन सैंपलों को 26 अक्टूबर, 2016 को जांच के लिए श्रीराम इण्डस्ट्रियल रिसर्च इंस्टिट्यूट नई दिल्ली को भेजा गया। अब सवाल उठता है कि पहले तो जांच कमेटी का गठन की पाइप फेल होने के बाद 5 माह बाद किया गया और फिर सैंपल लेने के बाद 6 माह बाद उन्हें जांच के लिए क्यों भेजा गया। जांच कमेटी और विभाग के परियोजना अधिकारियों के पास इसका कोई जवाब नहीं है।

अरूण श्रीवास्तव, जगत और तारग की भूमिका सवालों में
अतिरिक्त मुख्य अभियंता परियोजना जयपुर द्वारा जांच कमेटी में तत्कालीन अधीक्षण अभियंता परियोजना जयपुर अरूण श्रीवास्तव, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता परियोजना टोंक अरूण श्रीवास्तव अतिरिक्त चार्ज के तकनीकी सहायक एवं अधिशाषी अभियंता जगत तिवारी और अधिशाषी अभियंता परियोजना सांभर दलीप तारग के साथ प्रोजेक्ट का काम देख रही मैसर्स प्रतिभा इण्डस्ट्रीज कंपनी के प्रतिनिधि को शामिल किया। यह पूरी जांच कमेटी इसी परियोजना के कार्यों से जुड़ी हुई थी। जांच कमेटी में इन्हीं लोगों को इसलिए शामिल किया गया था, ताकि इस पूरे मामले को रफादफा किया जा सके। जांच कमेटी ने किया भी ऐसा ही, इस पूरे मामले को कमेटी ने ठंडे बस्ते में डाल दिया और क्वालिटी कंट्रोल विंग को गुमराह करते रहे। जांच कमेटी पर टाटा कंपनी के डीआई पाइपों के सैंपल बदलने के भी आरोप उठे थे, लेकिन फिर भी विभाग के आलाधिरियों ने कोई कार्रवाई नहीं की। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार इस पूरे मामले में डीआई पाइपों को पास कराने के लिए टाटा कंपनी को मोटा पैसा खर्च करना पड़ा था।

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