बाल मुकुन्द ओझा
हमारा देश एक बार फिर मोटे अनाज की ओर लौट रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार सेहत के मामले में मोटा अनाज कहीं ज्‍यादा गुणकारी है। मोटा अनाज फाइबर का अच्‍छा स्रोत होता है और आपके शरीर के लिए बहुत अच्‍छा माना जाता है। इनके सेवन से हमारी सेहत को कई तरह के फायदे होते हैं। इन पंक्तियों के लेखक को बहुगुणकारी मोटे अनाज की महत्ता को देख सुनकर अपनी पारिवारिक हाथ चक्की की याद आ गई। इसी के साथ अपने गांव चूरू के पुश्तैनी घर से सौ साल पुरानी अपनी पारिवारिक पत्थर चक्की अपने वर्तमान निवास, राजस्थान की राजधानी जयपुर में ले आये। इस चक्की से प्रतिदिन मोटे अनाज की पिसाई कर चार से पांच रोटी बनाकर तैयार की जाने लगी है। बाजरा, ज्वार, रागी, चन्ना के साथ गेंहू मिश्रित यह रोटी स्वादिष्ट तो है ही साथ ही चक्की चलाने से एक नहीं अनेक फायदे होने लगे। महँगी बिजली का झंझट भी नहीं है। पुराने जमाने में घर घर में पत्थर से बनी हाथ चक्की होती थी जिसमें महिलाएं अनाज और मसाले पीसती
थी। इसका मतलब आम के आम और गुठलियों के भी दाम। कहने का मतलब है घर का काम भी हो जाता और आपका स्वास्थ्य भी बना रहता। इससे आपके शरीर को कई तरह के फायदे मिलते। आज ये चक्की देखने को नहीं मिलती। वर्तमान में इसका स्थान चक्की चलनासन नामक योग ने ले लिया है। इसीलिए कहा जाता है मोटा अनाज और हाथ चक्की का चोली दामन का साथ है। आइये यहाँ हम हाथ चक्की के फायदों की बात करते है। हमारे देश में जब बिजली और पेट्रोल, डीजल की कोई माकूल व्यवस्था नहीं थी तब पत्थरों से बनी चक्कियों का बहुतायत से प्रचलन था। ये चक्की घर घर में मिलती थी। इस चक्की में अनाज और दालों की विशेष रूप से पिसाई की जाती थी। वजन में भारी भरकम एक चक्की कम से कम 50 किलो तो होती ही थी। किन्तु अब इसका प्रयोग लगभग समाप्त सा हो गया है। चक्की अब सिर्फ अतीत की एक वस्तु होकर रह गई है। आज का युवा इन चक्कियों के बारे में नहीं जानता है।
ये चक्की पत्थरों के दो पाटों से मिलकर बनी होती थी। ये पत्थर वजन में भारी होते जिन्हें गोल-गोल घुमाकर अनाज और दालें आदि पीसा जाता था। जब बिजली नहीं थी तो छोटे बड़े लगभग सभी कस्बों व गाँव-देहात की महिलाएँ अपने घरों में ही पत्थर के पाटों से बनी हाथ की इस चक्की से गेंहूँ ,ज्वार, बाजरा, रागी, कुट्टु, काकुन, चीना, सांवा, कोदो आदि अनाज पीस लिया करती थीं। वजन में भारी पत्थरों से बनाई जाने वाली इन चक्कियों के निचले पाट की ऊपरी सतह और ऊपरी पाट की निचली सतह खुरदरी रखी जाती थी जिससे इनके बीच में पीसा जाने वाला अनाज, गेंहू, ज्वार आदि आसानी से पिसा जासके। चक्की के ऊपर वाले पाट में किनारे की तरफ एक छिद्र होता जिसमें मजबूत लकड़ी से बना हुआ एक हत्था लगा रहता था। इसी हत्थे की मदद से चक्की को घुमाया जाता था। पाट में एक दूसरा छिद्र बिल्कुल बीच में होता था। जिसमें से पीसा जाने वाला अनाज डाला जाता था। जब चक्की को घुमाते हैं तो अनाज दोनों पाटों के बीच में घूमते हुए पाटों के वजन से पिसना प्रारम्भ हो जाता था। इस प्रकार लगातार चक्की को घुमाते हुए अनाज को महीन पीस लिया जाता। इस प्रकार पीसा गया अनाज शत-प्रतिशत शुद्ध और स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होता था । हमारी दादी नानी आज भी बताती है की 70 -80 वर्ष पूर्व जब वो ब्याह कर आयी तब इसी चक्की से वे आटा पिसती थी। छोटी मोटी शारीरिक व्याधियां इससे दूर ही रहती थी। चक्की पीसने से किसी योग या व्यायाम की जरुरत नहीं होती थी। चक्की में पूरे शरीर का व्यायाम होता था। इस दौरान महिलाओं में उनका भ्रूण लचीला रहता था और लचीले भ्रूण की वजह से उन्हें संतान जनने में किसी तरह की बाधा नहीं होती थी जो आजकल की महिलाओं में बहुतायत पायी जाती है। सीजेरियन प्रसव नाम की कोई चीज नहीं होती थी। इस चक्की की बदौलत पुराने समय की हमारी दादी और माताओं के 8-10 संतानें होती
थीं, फिर भी कभी सिजेरियन या इससे जुड़े किसी समतुल्य शब्द का वर्णन इतिहास में पढ़ने को नहीं मिलता। इस ऐतिहासिक चक्की के लुप्त हो जाने से कई बड़े नुकसान हुए हैं। प्रथम ताजे पिसे हुए आटे की गुणवत्ता से हम वंचित हो चुके हैं तथा दूसरा, माताओं-बहनों को प्रसव सम्बन्धी शिकायतों के अलावा हार्मोनल दिक्कतें आने लगी हैं। यांत्रिक विकास के बाद बिजली की सहायता से चलने वाली चक्कियां आ गईं। हालाँकि इनके आने से महिलाओं को बहुत राहत मिली क्योंकि हाथ की चक्की से आटा पीसने में उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। बहुत से क्षेत्रों में आज भी पत्थर से बनी चक्कियां देखने को मिल जाती है। कुछ जुगाड़ू लोग बिजली की मोटर लगाकर इसकी बिक्री कर रहे है मगर वो मजा अब कहाँ जो पारम्परिक चक्कियों में देखने को मिलता था।

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