जयपुर। आखिर रणभेरी बज गई। अब 11 मार्च और उसके बाद भी करीब सप्ताह भर तक पूरा देश चुनावी कयासबाजी की जुगाली में व्यस्त रहेगा। अपने-अपने आकलन, अपने अपने सर्वे और अपने-अपने दावे, लेकिन यह तय है कि यह चुनाव मौजूदा केन्द्र सरकार और इसके अब तक सबसे बडे निर्णय नोटबंदी पर सबसे बडा जनमत संग्रह साबित होगा।
चुनाव भले ही विधानसभाओं का है, लेकिन इस चुनाव में 16 करोड मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। अहम बात यह है कि यह चुनाव केन्द्र सरकार के सबसे बडे निर्णय नोटबंदी के तुरंत बाद हो रहा है। नोटबंदी के बाद अब तक हुए नगरीय निकायों आदि के चुनाव तक भाजपा जीतती रही है, लेकिन यह चुनाव इस बात को तय करेगा कि सरकार यह फैसला कितना सही या गलत था। यह महत्वपूर्ण इसलिए भी हो जाएग कि नोटबंदी के तूफ ान से उठा गुबार चुनाव होने तक छंट जाएगा और इसके वास्तविक प्रभाव सामने आने लगेंगे। यही नहीं यह चुनाव पांच बिल्कुल अलग-अलग तरह के राज्यों में हो रहा है। एक तरफ उत्तर प्रदेश है, जहां जातियता और धनबल व बाहुबल का प्रभाव है, वहीं दूसरी तरफ पंजाब है जो कृषि और किसानों से जुडा है। इसके अलावा उत्तराखंड और गोवा जैसे पर्यटन राज्य है और इनके साथ मणिपुर है जो उत्तर पूर्व के लोगों की भावना सामने लाएगा। यानी इस चुनाव में नोटबंदी से प्रभावित लगभग हर वर्ग की बात देश के अलग-अलग क्षेत्रों से सामने आ जाएगी।

– उत्तर प्रदेश पर रहेगी नजर

देश के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश का चुनाव इस बार होने जा रहा है। उत्तर प्रदेश पूरे देश की राजनीति की दिशा तय करता रहा है और इस बार भी ऐसा ही कुछ होता दिख रहा है, क्योंकि भाजपा इस बार लम्बे समय बाद उत्तर प्रदेश में अपना सबसे बडा दांव खेलने जा रही है। चुनाव में चेहरा इस बार भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही है। ऐेसे में दांव और भी बडा हो जाता है। पिछले चुनाव में तीसरे स्थान पर रही भाजपा इस बार पहले स्थान पर आने के लिए एडी चोटी का जोर लगा रही है। नोटबंदी के हथियार से भाजपा ने सबसे बडी दावेदार बसपा की कमर तोडी तो सत्तारूढ समाजवादी पार्टी खुद की कलह में उलझ गई। कांग्रेस को अभी भी समाजवादी पार्टी की बैसाखियों का इंतजार है, ऐसे में भाजपा के लिए यहां का दाव इतना उंचा है कि यहां की जीत और हार का असर 2019 के लोकसभा तक बना रहेगा।

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