Adopted

– रेखा चौरसिया 
बच्चों की दिनचर्या शुरू होती है भागदौड़ भरी जिंदगी से। अल सुबह उठना, तैयार होना और चल देना स्कूल की ओर। दिनभर की पढ़ाई के बाद थक-हारकर दोपहर बाद घर लौटना। यहां आते ही उनके चेहरे पर चमक आ जाती है, लेकिन यह ज्यादा देर नहीं टिकती। अभिभावक कुछ ही देर में उनका बैग खोलकर कहते हैं- चलो होमवर्क करो। बच्चे को मन मारकर होमवर्क पूरा करना ही पड़ता है। जब सांझ ढलने लगती है तो उसे लगता है अब तो खेलने-कूदने को मिलेगा, लेकिन इतने में ही ट्यूशन का समय हो जाता है। यहां से लौटते ही खाना खाने और फिर सोने का वक्त हो जाता है। बच्चों का उन्मुक्त मन कोई अठखेली करने को करता है तो उसे डांट मिलजी है- चलो सो जाओ, सुबह स्कूल जाने के लिए जल्दी उठना है। इस दिनचर्या में कहीं बचपन दिखाई देता है?

आज बच्चे अपने बचपन को ढूंढ रहे हैं। हंसने-खेलने की उम्र में बच्चे किताबों का बोझ ढोह रहे हैं। लगभग पांच दशक पहले पहली से पांचवीं कक्षा के विद्यार्थियों पर इतना बोझ नहीं था। मसलन पहली कक्षा के लिए एक किताब और दूसरी के लिए दो और तीसरी के लिए तीन और चौथी, पांचवीं के लिए चार किताबें होती थीं। शिक्षा के निजीकरण से और कोई फायदा हुआ हो या नहीं, लेकिन किताबों की संख्या जरूर बढ़ गई है। पहली कक्षा में ही बच्चों को छह पाठ्य पुस्तकें व छह नोट बुक्स दी जाती हैं। मतलब पांचवीं कक्षा तक के बस्तों का बोझ करीब आठ किलो हो जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि 12 साल की आयु के बच्चों को भारी स्कूली बस्तों की वजह से पीठ दर्द का खतरा पैदा हो गया है। इससे बच्चों को पीठ, घुटने व रीढ़ पर असर पड़ रहा है। आजकल बहुत सारे बच्चे इसके शिकार हो रहे हैं।
किताबों के बोझ का दूसरा नुकसान बच्चों में व्यावहारिक ज्ञान की कमी है। किताबें ही इतनी अधिक हो गई हैं कि उसे व्यवहारिक ज्ञान मिल ही नहीं पाता। कान्वेंट स्कूलों में छोटी कक्षा के मासूमों व दसवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के बराबर होमवर्क दिया जा रहा है, जिससे देर रात्रि तक इन छात्रों को सिर उठाने की फुर्सत नहीं होती, खेलना किसने देखा। बच्चे स्कूल से घर आकर न तो कुछ वक्त फुर्सत के निकाल पाते हैं और न ही खेलों के लिए उचित समय मिल पा रहा है। बढ़ी स्पर्धा के दौर में सरकारी स्कूलों को छोडक़र अभिभावक अपने नौनिहालों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं।

समाज में बच्चों को ‘बड़ा’ बनाने की ऐसी होड़ मची है कि किसी को उनके बचपन की फिक्र नहीं है। बच्चों से ज्यादा प्रतिस्पर्धा अभिभावकों के बीच में है। इसमें अव्वल आने के लिए वे नामी स्कूल ढूंढ़ते हैं। ट्यूशन के लिए अच्छे अध्यापक की तलाश करते हैं। इस आपाधापी में उन्हें बच्चों की मन की बात जानने जानने का समय ही कहां मिलता है? अभिभावक तो स्कूल में दाखिला करवाते ही यह तय कर लेते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर क्या बनेगा। वे यह नहीं सोच पाते कि उनका यह सपना उनके ही नौनिहाल के बचपन पर किस कदर भारी पड़ रहा है। मनोविज्ञान कहता है कि बच्चों को उनकी इच्छा और योग्यता के अनुसार आगे बढऩे का मौका दिया जाए। अगर अभिभावक बच्चे पर किसी खास क्षेत्र में जाने के लिए दबाव डाला जाता है तो उसके मन में कई प्रकार की विकार आ जाते हैं। जो बच्चे मां-बाप की उम्मीद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ पाते वे हीनभावना का शिकार हो जाते हैं। इनमें से कई आत्महत्या जैसा दुखदायी कदम भी उठा लेते हैं।

जो बच्चे मां-बाप की ओर से तय की हुई मंजिल को पा लेते हैं, उन्हें समाज भले ही सफल मान ले, लेकिन ये भी कई मनोवैज्ञानिक विकारों के शिकार हो जाते हैं। मौलिकता और रचनात्मकता तो इनमें बचती नहीं है। हर निर्णय के लिए मां-बाप पर निर्भर रहना इनके लिए बड़ी समस्या बन जाता है। नौकरी ही नहीं, निजी जीवन में भी इन्हें फैसले लेने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इससे जो तनाव होता है, उसे देखकर अभिभावक भी अवसाद में आ जाते हैं। समूचे समाज को इस स्थिति को समझना चाहिए। आज के समय अभिभावकों को अपनी अपेक्षाएं सीमित करनी चाहिए। बच्चों को उनकी आयु और समय के अनुसार विकास करने का अवसर देना चाहिए। हम सब जानते है कि यदि अंकुरित बीज को किसान जरूरत से ज्यादा खाद और पानी दे दे तो उपज बोए गए बीज के बराबर भी नहीं हो पाती। आइए बच्चों को एक स्वस्थ वातावरण पढ़ाई के लिए दें। न कि उन्हें रोबोट बनाकर अपनी अपेक्षाओं को उन पर लादें। निर्णय हम सब को लेना है कि हम बच्चों को ज्ञान देना चाहते है या उनसे मानसिक मजदूरी करवाना चाहते है।
(लेखिका राजकीय प्राथमिक विद्यालय, सुखिया में प्रधानाध्यापिका हैं)

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