-बाल मुकुन्द ओझा
राजस्थान में सचिन पायलट बनाम अशोक गहलोत की जंग तेज हो गई है। इसी के साथ गहलोत सरकार आपसी अंतरकलह से जूझने लगी है। कांग्रेस आलाकमान के अनुशासन की एडवाइसरी की सरेआम धज्जिया उड़ाते हुए कांग्रेसी नेताओं ने परस्पर विरोधी बयानबाज़ी शुरू कर दी है। ताज़ा विवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मानगढ़ के आदिवासी सम्मलेन में मुख्य मंत्री अशोक गहलोत की कथित तारीफ के बाद शुरू हुआ है। असंतुष्ट नेता सचिन पायलट ने इसे गुलाम नबी आज़ाद से जोड़कर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है जिस पर भारी सियासी बवाल उठ खड़ा हुआ है। आपसी गुटबाजी मामले में पहली बार सचिन पायलट ने चुप्पी तोड़ी है। पायलट के बयान से चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। पायलट ने गहलोत का नाम लिए बग़ैर कहा कि एक बार पीएम मोदी ने आज़ाद की तारीफ़ की थी उसके बाद जो घटनाक्रम हुआ सबको मालूम है। अब जिस तरह की बातें मोदी ने मंच से कही वो भी इसी तरह की हैं। राजस्थान के घटनाक्रम को लेकर पायलट बोले कि अब मल्लिकार्जुन खरगे अध्यक्ष बने हैं तो उम्मीद है कि राजस्थान में विधायक दल कि बैठक में नहीं होने के मामले में जिन तीन नेताओं को नोटिस जारी किए गए हैं उन पर भी पार्टी आलाकमान जल्द फ़ैसला करेगा। इस बयान पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की तल्खी दिखी है। अशोक गहलोत ने कहा कि सचिन पायलट को ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। केसी वेणुगोपाल ने पार्टी में सभी से ऐसी कोई टिप्पणी नहीं करने को कहा है। हम चाहते हैं कि सभी अनुशासन का पालन करें। इससे पूर्व एक मंत्री राजेंद्र गुढा ने सचिन को मुख्य मंत्री का पद सौंपने की सरेआम मांग की थी। गुढ़ा ने अनुशासनहीनता में लिप्त तीनों मंत्रियों को बर्खास्त करने की मांग की है। वहीँ पलटवार करते हुए गहलोत समर्थक जलदाय मंत्री महेश जोशी ने बिना नाम लिए पायलट की आलोचना की और कहा जिन लोगों ने
बगावत की वे हमें अनुशासन का पाठ न पढ़ाएं। जोशी ने कहा अशोक गहलोत जी को अपनी निष्ठा साबित करने के लिए किसी के प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है। सियासी उठापटक के बीच मंत्रियों और विधायकों ने चौक चौराहों पर अपनी नाराजगी के तीखे तेवरों से कांग्रेस सियासत को हिलाकर रख दिया है। जैसे जैसे विधानसभा चुनावों की तिथि नज़दीक आती जा रही है वैसे वैसे राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस में घमासान थमने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। हालाँकि विधान
सभा चुनावों में अभी एक साल शेष है मगर हायतौबा अभी से मच गई है। उदयपुर में आयोजित चिंतन शिविर में नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुटता और अनुशासन का जो सन्देश दिया था लगता है वह जल्द ही फुर्र हो गया है।

एक वरिष्ठ कांग्रेसी विधायक भरत सिंह ने मुख्य मंत्री को पत्र लिखकर उनके एक काबीना मंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के साथ सबूत भेजे है। गहलोत के एक विश्वस्त मंत्री महेश जोशी के बेटे पर रेप केस में गिरफ़्तारी की तलवार लटकी हुई है। सचिन पायलेट की नाराजगी भी अभी ज्यों की त्यों कायम है। इसी के साथ कांग्रेस में एक दूसरे पर तंज कसने का सिलसिला शुरू हो गया है। कांग्रेस सरकार में मचा घमासान चर्चा का विषय बना हुआ है। गौरतलब है 2018 में राजस्थान विधानसभा चुनाव के बाद से अशोक गहलोत और सचिन पायलट में खींचतान चल रही है। 2018 में जब कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई थी तो उस वक्त कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट थे। ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि गांधी परिवार मुख्यमंत्री की कुर्सी उन्हें सौपेगा। लेकिन उस वक्त आलाकमान ने अशोक गहलोत की वरिष्ठता और अनुभव को ध्यान में रखकर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया था। जबकि सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन दो साल के अंदर ही साल 2020 में सचिन पायलट ने बगावती तेवर दिखाने लगे थे। उसके बाद गांधी परिवार के दखल के बाद मामला शांत हुआ था। लेकिन इस खींचतान में सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी थी। पायलट को मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद, उस वक्त एक बार फिर जग गई, जब इस तरह की चर्चाएं तेज थी कि अशोक गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जा सकते हैं। लेकिन गहलोत समर्थकों के खुलकर विरोध में आने के बाद, गहलोत ने अध्यक्ष पद की रेस से अपने आपको बाहर कर लिया और मुख्यमंत्री की कुर्सी बरकरार रखी। काफी समय चुप्प रहने के बाद पायलट ने एक बार फिर जंग छेड़ दी है। अब वो आरपार की लड़ाई के मूढ़ में है। सियासी खींचतान के बीच सचिन पायलट कह चुके हैं कि वह कांग्रेस के सिपाही है। कांग्रेस नहीं छोड़ेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पायलट कांग्रेस में रहकर ही गहलोत पर हमला करते रहेंगे।

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