High Court

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने बिना भर्ती प्रक्रिया अपनाए 2009 में बैकडोर एन्ट्री के जरिए हाईकोर्ट में कनिष्ठ न्यायिक सहायक पद पर तदर्थ आधार पर नियुक्त किए 21 कर्मचारियों को नियमित करने के 10 अगस्त 2009 और वर्ष 2013 में स्थाई करने के आदेशों को अवैध मानते हुए रद्द कर दिया है। हालांकि अदालत ने नौ साल से काम कर रहे इन कर्मचारियों को राहत देते हुए कहा है कि यदि हाईकोर्ट प्रशासन चाहे तो आगामी भर्ती में इन्हें आयू सीमा में छूट दे सकता है। न्यायाधीश मनीष भंडारी और न्यायाधीश डीसी सोमानी की खंडपीठ ने यह आदेश त्रिलोक चन्द सैनी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।

अदालत ने कहा है कि हाईकोर्ट प्रशासन कर्मचारियों को तदर्थ व अस्थाई आधार पर नियुक्ति दे सकता है, लेकिन हाईकोर्ट के नियम 16(3) इन्हें नियमित करने का अधिकार नहीं देता है। पद पर नियमित भर्ती नहीं होने तक ही वे पद पर बने रह सकते हैं। हाईकोर्ट नियमों के अनुसार तदर्थ आधार पर नियुक्ति पाने वाले परीवीक्षा व नियमितीकरण के लिए दावा नहीं कर सकते हैं। इन कर्मचारियों को नियम तीन के विपरीत जाकर नियमित किया गया है। ऐसे में उनकी पदोन्नति भी खत्म हो गई है। अदालत ने कहा कि यह नियुक्तियां पारदर्शिता से नहीं हुई हैं। इसलिए इन्हें नियमित करना सही नहीं माना जा सकता।

याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट में वर्ष 2009 में 21 लोगों को बिना भर्ती विज्ञापन ही कनिष्ठ न्यायिक सहायक के पद पर नियुक्तियां दी गई हैं। जिन्हें नियुक्तियां दी गई वे हाईकोर्ट में कार्यरत वर्तमान व पूर्व अधिकारी व कर्मचारियों के रिश्तेदार हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार ऐसी नियुक्तियां अवैध हैं। ऐसे में या तो याचिकाकर्ता को भी इसी तरह नियुक्ति दे या इन 21 कर्मचारियों को पद से हटाया जाए। वहीं हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से कहा गया कि मुख्य न्यायाधीश को नियुक्ति का अधिकार है। इसलिए हाईकोर्ट इसमें अपना दखल नहीं दे सकता। कर्मचारियों को काम करते हुए नौ साल हो गए हैं। इस पर अदालत ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश केवल तदर्थ व अस्थाई आधार पर ही नियुक्ति दे सकते हैं। इसके साथ ही अदालत ने बैकडोर से दी गई इन कर्मचारियों के स्थाईकरण और नियमित करने के आदेशों को रद्द कर दिया है।

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