-बाल मुकुंद ओझा
देश और दुनिया में जलवायु परिवर्तन और अन्य मानव जनित कारणों से वनों में आग लगने की घटनाएं तीन गुना से अधिक बढ़ गई हैं। उत्तरी अमेरिका, अमेजन के जंगलों और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में यह घटना तेजी से बढ़ी है। इसकी वजह है पृथ्वी का गर्म होना। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के महासचिव ने कहा, "जैसे-जैसे धरती गर्म हो रही है वैसे-वैसे जंगलों में आग लगने की आशंकाएं बढ़ती जा रही है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन की नई रिपोर्ट के मुताबिक, लंबे समय तक सूखा पड़ने और धरती के तेजी से गर्म होने की वजह से जंगलों में लगने वाली आग की घटनाएं बढ़ रही हैं। जलवायु परिवर्तन और तापमान सामान्य से बहुत अधिक होने से जंगलों में आग लगने की घटनाओं में भी तेजी से इजाफा होने लगा है। जंगल में आग लगने के कई कारण होते हैं। इनमें ईंधन, ऑक्सीजन और गर्मी मुख्य है। अगर गर्मियों का मौसम है, तो सूखा पड़ने पर ट्रेन के पहिए से निकली एक चिंगारी भी आग लगा सकती है । इसके अलावा कभी-कभी आग प्राकृतिक
रूप से भी लग जाती है। ये आग ज्यादा गर्मी की वजह से या फिर बिजली कड़कने से लगती है। जंगलों में आग लगने की ज्यादातर घटनाएं इंसानों के कारण होती हैं, जैसे आगजनी, कैम्पफायर, बिना बुझी सिगरेट फेंकना, जलता हुआ कचरा छोड़ना, माचिस या ज्वलनशील चीजों से खेलना आदि। जंगलों में आग लगने के मुख्य कारण बारिश का कम होना, सूखे की स्थिति, गर्म हवा, ज्यादा तापमान भी हो सकते हैं। इन सभी कारणों से जंगलों में आग लग सकती है। जंगलों में आग से करोड़ों अरबों की वन संपदा खाक हो जाती है। पेड़ पौधों के साथ जंगली जानवर मौत के शिकार होते है वहां भूमि भी बंजर हो जाती है। कई अध्ययनों के अनुसार भारत में जंगल में आग की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। भारत की बात करे तो वर्ष 2020-2021 में जंगलों में आग की 3.98 लाख से अधिक घटनाओं की सूचना मिली जो पिछले वर्ष की तुलना में दोगुने से अधिक है। भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार 1 जनवरी से 31 मार्च 2022 तक देश में एक लाख 36 हज़ार से अधिक जगहों से आग फैली जिसने मीलों तक जैव-विविधता से भरपूर जंगलों को जलाकर राख कर दिया। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर के एक अध्ययन में बताया गया कि पिछले दो दशकों में जंगलों में आग के हादसों में दस गुना वृद्धि हुई है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जंगलों की आग पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि पर्यावरण मंत्रालय और अन्य प्राधिकरण वन क्षेत्र में आग लगने की घटना को हल्के में लेते हैं। जब भी ऐसी घटनाएं
घटती हैं, तो किसी ठोस नीति की आवश्यकता महसूस की जाती है। लेकिन बाद में सब कुछ भुला दिया जाता है।
दरअसल जंगलों की आग से न केवल प्रकृति झुलसती है, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारे व्यवहार पर भी सवाल खड़ा होता है। गर्मियों के मौसम मेंभारत में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के जंगलों में आग लगने की घटनाएं अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं। जंगलों में लगी आग से जान-माल के साथ-साथ पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। पेड़-पौधों के साथ-साथ जीव-जन्तुओं की विभिन्न प्रजातियां जलकर राख हो जाती हैं। जंगलों में विभिन्न पेड़-पौधे और जीव-जन्तु मिलकर समृद्ध जैव विविधता की रचना करते हैं। पहाड़ों की यह समृद्ध जैवविविधता ही मैदानों के मौसम पर अपना प्रभाव डालती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ऐसी घटनाओं के इतिहास को देखते हुए भी कोई ठोस योजना नहीं बनाई जाती है। एक अध्ययन के अनुसार, पूर्व एशिया, दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और समुद्र तटीय क्षेत्रों में जंगलों में आग लगने की समस्या बढ़ती जा रही हैं। जंगलों में यदि आग विकराल रूप धारण कर लेती है, तो उसे बुझाना आसान नहीं होता है। कई बार जंगल की आग के प्रति स्थानीय लोग भी उदासीन रहते हैं। दरअसल हमारे देश में ऐसी आग बुझाने की न तो कोई उन्नत तकनीक है और न ही कोई स्पष्ट कार्ययोजना। विदेशों में जंगल की आग बुझाने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य होता है। पिछले दिनों नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जंगलों की आग पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि पर्यावरण मंत्रालय और अन्य प्राधिकरण वन क्षेत्र में आग लगने की घटना को हल्के में लेते हैं। जब भी ऐसी घटनाएं घटती हैं, तो किसी ठोस नीति की आवश्यकता महसूस की जाती है। लेकिन बाद में सब कुछ भुला दिया जाता है।

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