भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो राजस्थान ने बायोफ्यूल अथॉरिटी के सीईओ सुरेंद्र सिंह राठौड़ को पांच लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा। गिरफ्तारी के वक्त राठौड़ ने खुद को एक हजार करोड़ रुपये का आदमी बताते हुए एसीबी अधिकारियों पर रौब झाडऩे की कोशिश की। एसीबी की प्राथमिकी जांच में राठौड़ के पास करोड़ों रुपयों की चल व अचल सम्पत्ति मिली है। घर से चार करोड़ रुपये कैश मिले हैं, जो संभवतया: रिश्वतखोरी से प्राप्त किए हुए लगते हैं। महंगी कारों का काफिला मिला है। बेटे के नाम खान व दूसरे दस्तावेज भी मिले हैं। बताया जाता है कि एक दशक में ही राठौड़ ने उक्त पद पर रहते हुए एक सौ करोड़ रुपये की सम्पत्ति इकटठी की है, यह सम्पत्ति नियम विरुद्ध तरीके से अर्जित आय से प्राप्त की है। एसीबी ने इंकम टैक्स, ईडी को राठौड़ की सम्पत्तियों के बारे में अवगत करा दिया है। अगर राठौड़ ने उक्त सम्पत्तियां रिश्वत व अन्य नियम विरुद्ध तरीकों से अर्जित की है, वह जब्त कर ली जाएगी। साथ ही आय से अधिक सम्पत्ति समेत अन्य धाराओं में मुकदमें चलेंगे सो अलग। राठौड़ के पहले भी कई आला अधिकारी लाखों रुपये की रिश्वत लेते हुए धरे जा चुके हैं। हर साल दर्जनों ऐसे अधिकारी ट्रेप होते हैं। उनके पास करोड़ों व अरबों रुपयों की सम्पत्ति मिल रही है। हर साल दर्जनों अधिकारी ट्रेप होने के बाद भी घूसखोरी पर लगाम लग नहीं पा रही है। बल्कि घूसखोरी के केसों में ईजाफा ही हो रहा है। राठौड़ से पहले वरिष्ठ आईएएस अशोक सिंघवी ढाई करोड़ रुपये की रिश्वत लेते हुए धरे गए थे। आईआरएस सहीराम मीणा, आरएएस बीएल मेहरड़ा व सुनील शर्मा, एडिशनल कमिश्नर अनुसुइया, सीताराम वर्मा एग्जीक्यूटिव इंजीनियर भी लाखों रुपयों की रिश्वत लेने और उनके यहां सर्च में लाखों-करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति मिलने के मामले में गिरफ्तार हो चुके हैं। आला अधिकारियों के अलावा अन्य अधिकारी, लिपिक व कर्मचारी रिश्वत लेने के मामले में गिरफ्तार होते रहते हैं। ऐसा कोई दिन नहीं जाता है, जब एक या दो कर्मचारी रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार नहीं होते। कई बार तो दिन में पांच से सात केस ट्रेप के हो रहे हैं। रिश्वतखोरी के बढ़ते मामलों को देखते हुए लगता है कि देश में तमाम कानूनों के बावजूद सरकारी कार्यालयों में रिश्वत का प्रचलन कम नहीं हो पा रहा है, बल्कि तेजी से बढ़ ही रहा है। बिना लिए-दिए कर्मचारी काम नहीं कर रहे हैं। मजबूरन आम जनता, व्यापारी, किसान सभी को रिश्वत देनी पड़ रही है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि रिश्वत पर लगाम नहीं लगने का एक बड़ा कारण रिश्वतखोरी अधिकारी व कर्मियों के विरुद्ध देश में कठोर कानून नहीं होना बड़ी वजह है। कठोर कानून नहीं होने के कारण अधिकारियों व कर्मचारियों में कानून का भय नहीं है। वहीं रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़े जाने के बाद भी अभियोजन स्वीकृति नहीं मिलने के चलते दोषी अफसर व कर्मचारी का निलंबन खत्म हो जाता है और वे सर्विस पर आ जाते हैं। कोर्ट में केस लंबित रहते हैं। अभियोजन व मामले की सुनवाई में सालों लग जाने के कारण दोषी कर्मचारी व अफसर केस को मैनेज कर लेते हैं। कानून में सजा के प्रावधान भी काफी कम है। करोड़ों रुपयों के चारे घोटाले के बाद भी राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव व अन्य आरोपियों को मात्र पांच-पांच साल की सजा हुई। कम सजा के कारण लोक सेवकों में कानून के प्रति ना तो भय है और ना ही किसी तरह का डर है। घूसखोरी पर लगाम तभी लग पाएगी, जब कानून में संशोधन करके इसमें सजा के कठोर प्रावधान किए जाए। रिश्वत के आरोप में दोषी ठहराए जाने पर आजीवन कारावास से कम के प्रावधान होने चाहिए। दोषी लोक सेवक की चल-अचल सम्पत्ति जब्त करने और रिश्वत लेते हुए पकड़े जाने पर तब तक नौकरी से बाहर रखा जाए, जब तक कोर्ट का फैसला ना आ जाए। तब तक उसके तमाम वेतन-भत्तों पर रोक लगी होनी के प्रावधान होने चाहिए। ऐसे मामलों में सरकार से अभियोजन स्वीकृत्ति के प्रावधान खत्म होने चाहिए। साथ ही कानून में ऐसे मामलों की सुनवाई एक साल में पूरी करने की मियाद तय की जाए। ऐसे कठोर प्रावधान से ही भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी पर अकुंश लग सकेगा। साथ ही लोक सेवकों में भय कायम होगा।

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