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Syndicate Bank, loan scam, CBI custody

संजय सैनी
जयपुर। सिंडीकेट बैंक का एक हजार करोड़ का घोटाला बैंक के चुनिंदा अफसरों और बैंककर्मियों की मिलीभगत से हुआ। आरोपी सीए भरत बम्ब और शंकर खंडेलवाल को फर्जी लोन देने में बैंक के अधिकारियों ने अपने अधिकारों का जमकर दुरुपयोग किया। बैंक अफसरों की मिलीभगत का फायदा उठा कर आरोपियों ने सिंडीकेट बैंक की एमआई रोड, मालवीय नगर शाखा और उदयपुर ब्रांच को छलने केलिए तीन तरीके अपनाए। इसमें अफसरों ने भी खूब साथ दिया। जांच के दौरान सीबीआई भी फर्जी तरीके से लोन उठाकर बैंक को अरबों रुपयों की धोखाधड़ी को देख चकित रह गए। हालांकि कई अफसर अभी भी सीबीआई जांच से बचे हुए हैं।

एक लोन लेकर दूसरा लोन चुकाया
सीबीआई को जांच में यह भी पता चला कि आरोपी बैंक अफसरों की मिलीभगत के कारण अभियुक्त शंकर खंडेलवाल ने एक बैंक से लोन लिया और दूसरे लोन को चुका दिया। गुमान ज्वैलर्स का नगद ऋ ण खाता आईडीबीआई बैंक टोंक रोड जयपुर में था, जिस पर 1 करोड 71 लाख 33 हजार 295 रुपए 27 मई 2011 के अनुसार बकाया था। इसे चुकाने के लिए 1 करोड 55 लाख रुपए मैससज् एवरेस्ट आशियाना ने फजीज् तरीके से प्राप्त किए। इसे गुमान ज्वैलसज् के आईडीबीआई बैंक जयपुर में ट्राँसफर किया गया। इससे नगद ऋ ण की राशि घट कर 16 लाख 33 हजार रुपए रह गई। बाद में इस रकम को चुका कर खाता बंद कर दिया।

इन अफसरों की मिलीभगत
इस संबंध में बैंक की ओर से ही दर्ज की गई एफआईआऱ में आरोपी महाप्रबंधक सतीश कुमार गोयल, उप महाप्रबंधक संजीव कुमार, एमआई रोड शाखा के चीफ मैनेजर देशराज मीणा, मालवीय नगर ब्रांच के सहायक महाप्रबंधक आदर्श मनचंदा, उदयपुर ब्रांच के सहायक महाप्रबंधक अवधेश तिवारी का नाम भी हैं। आरोपी अफसरों ने अपनी क्रेडिट लिमिट के खिलाफ जाकर लोन मंजूर किए।

फर्जी दस्तावेज से चैक व ड्राफ्ट डिस्काउंटिंग कर लगाया चूना
सीबीआई की चार्जशीट में साफ तौर पर बताया गया है कि फर्जी चैकों को डिस्काउंट कर बैक से धन प्राप्त किया। जाली एलआईसी पालिसियों के आधार पर ओवरड्राफ्ट लिया। फर्जी दस्तावेजों के आधार पर चैक व ड्राफ्ट डिस्काउंटिग कर बैंक से धन लिया। बाद में करोड़ों रुपए जुटा कर इस राशि का गबन कर लिया। बैंक के अधिकारियों ने इन आरोपियों पर बैंक का फंड लुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बैंक के इन जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी किसी दस्तावेजों की जांच नहीं कराई, जिससे यह साबित हो सके कि ये दस्तावेज फर्जी है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिस फर्जी एलआईसी पालिसियों के आधार पर लोन दिया गया, उसे चैक तक नहीं किया गया। एलआईसी की वेबसाइट पर जाकर ही इन पॉलिसियों को चैक कर लिया जाता तो संभवतया ओवरड्राफ्ट जारी ही नहीं होता। बैंक के इन जिम्मेदार अफसरों ने यह देखने की जहमत तो उठाई ही नहीं साथ में आरोपियों की ओर से दी जा रही एलआईसी पॉलिसियां अस्तित्व में भी है कि नहीं। पता लगते ही यह घोटाला पहले ही पकड़ में आ जाता और बैंक को करोड़ों रुपए का नुकसान नहीं होता। सीबीआई ने जब घोटाले की परतें खोली तो पता चला कि चैक, ड्राफ्ट डिस्काउंट करने एवं एलआईसी पालिसी के आधार लोन व फंड जारी करने के लिए अधिकारियों की अलग अलग पावर है। सिडीकेट बैंक के जोखिम प्रबंधन विभाग, कारपोरेट कार्यालय बैंगलोर की ओर से इस संबंध में 7 दिसंबर 2010 को जारी परिपत्र में प्रबंधक से लेकर प्रबंध निदेशक की तक की क्रेडिट लिमिट को परिभाषित किया हुआ है। इनमें मुख्य प्रबंधक की शक्तियां इस तरह से है।

लिमिट से बाहर जाकर दिए फंड
मुख्य प्रबंधक को फंड आधारित एवं गैर फंड आधारित सहित प्रति पार्टी सीमा 2.5 करोड़ की ही क्रेडिट लिमिट प्राप्त है। यह पार्टी को यह क्रेडिट लिमिट तभी मिलेगी जब मुख्य प्रबंधक को लगे कि इस क्रेडिट लिमिट की एवज में दी जा रही सिक्योरिटी पूरी तरह सुरक्षित है लेकिन असुरक्षित क्रेडिट लिमिट में यह पावर घट कर 25 लाख रुपए ही हो जाती है। अन्य मामलों में सिर्फ 12 लाख। बैंक के चीफ मैनेजर से लेकर ऊपर तक के सभी अधिकारियों ने अपनी पावर का दुरुपयोग किया जिससे लोन की राशि बढ़ती गई। बैंक की उदयपुर शाखा के तत्कालीन मुख्य प्रबंधक संतोष कुमार गुप्ता ने तो अभियुक्तों के साथ आपराधिक षडयंत्र कर भरत बम्ब और विपुल कौशिक सहित विभिन्न ग्राहकों को 2ण्5 करोड़ रुपए के असुरक्षित चैकों के जरिए क्रेडिट लिमिट दी। एस के गुप्ता ने जानबूझ कर एवं बेईमानी से असुरक्षित चैकों के मामले में अपनी 25 लाख से स्वीकृत सीमा का उल्लंघन किया। कपटता से अभियुक्तों को लाभ पहुंचाया। इसी तरह चैक व ड्राफ्ट डिस्काउंट मामलों में स्थानीय चैकों के मामले में किसी डिस्काउंटिग की अनुमति नहीं है। इसी तरह सीडीडी भुनाने की प्रक्रियां भी कुछ शर्तों के साथ है जिनकी पालना आरोपियों को लोन देने में नहीं की गई। बैंक के आरोपी अधिकारियों में एस के गुप्ता ने तो जानबूझकर एवं बेईमानी से इन फर्जी चैकों को डिस्काउंट किया। 25 लाख की शक्तियों से अधिक राशि के असुरक्षित चैक को डिस्काउंट करने के लिए प्राधिकृत किया। इनमें एक आरोपी शंकर खंडेलवाल ने गुमान ज्वैलर्स के मालिक अपने पिता मोहनलाल खंडेलवाल, मैसर्स गुमान फर्नीचर, गुमान फर्नीचर एंड इलेक्ट्रानिक्स के खातों में ट्रांसफर करने और व्यापार में निवेश करने के लिए किया गया।

क्रम सं. सुविधा की प्रकृति सहायक महाप्रबंधक मुख्य प्रबंधक

1 संचयी प्रति सीमा 500 लाख 250 लाख
250 लाख 125 लाख

2. उपरोक्त 1 में से 500 लाख 250 लाख
फंड आधारित एवं 250 लाख 125 लाख
गैर फंड आधारित

3 उपसीमा आरक्षित 100लाख 25 लाख
फंड आधारित व 50 लाख 12 लाख
गैर फंड आधारित

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