-राकेश कुमार शर्मा
जयपुर। राजस्थान के धौलपुर सीट पर हुए उप चुनाव के गुरुवार को आए चुनाव नतीजे भाजपा के पक्ष में रहे। भाजपा प्रत्याशी शोभारानी ने कांग्रेस प्रत्याशी बनवारी लाल शर्मा को रिकॉर्ड 38 हजार से अधिक मतों से शिकस्त दी। धौलपुर सीट की इस जीत से भाजपा में उत्साह है तो कांग्रेस में निराशा का माहौल है। शोभारानी की जीत से भाजपा खासकर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को खासा संबल मिला है और उनके विरोधी खेमे ने उन्हें हटाने की जो मुहिम चला रखी है, उस पर ब्रेक लग सकते हैं। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के लिए संकट बढ़ाने वाला है। अब उनका विरोधी खेमा ज्यादा सक्रिय होकर इस हार का ठीकरा उनके सिर पर डालेगा। इस सीट को भाजपा व कांग्रेस प्रतिष्ठा का सवाल मानकर लड़ रही थी। अगले साल दिसम्बर में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले इस उपचुनाव को दोनों ही दल सेमीफाइनल मानकर चले रहे थे। इसे जीतने के लिए दोनों ही दलों ने अपने सभी अनुभवी नेताओं और कार्यकर्ताओं की टीमें चुनावी मैदान में लगा दी थी। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने पूरा चुनाव प्रबंधन अपने हाथ में ले रखा था और वे खुद भी दस दिन से अधिक समय तक इस क्षेत्र में रही। उन्हीं की मेहनत का नतीजा रहा कि आज भाजपा की शोभारानी वहां से रिकॉर्ड मतों से जीती। अगर भाजपा यह सीट नहीं जीतती को राजे का विरोधी खेमा जो यूपी चुनाव के बाद से ज्यादा ही सक्रिय है, इसे मुद्दा बनाकर घेरने की फिराक में रहता। वैसे भी यूपी चुनाव के बाद से राजस्थान में सीएम राजे को केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में भेजने और यहां यूपी के प्रभारी ओमप्रकाश माथुर को सीएम बनाने की खूब चर्चाएं हो रही है। यह भी चर्चा चलती रही कि अगर धौलपुर चुनाव में पार्टी की हार होती है तो विरोधी खेमा पूरे जोर-शोर से उन्हें घेरता और हटाने की मुहिम तेज करता है। उनका तर्क है कि भले ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा दो तिहाई बहुमत से अधिक सीटों पर जीती हो, लेकिन सत्ता में आने के बाद चार सीटों पर उप चुनाव हुए हैं, उनमें से तीन सीटों पर भाजपा की हार हुई। कोटा दक्षिण सीट से भाजपा प्रत्याशी संदीप शर्मा जीत पाए थे। नसीराबाद, वैर और सूरजगढ़ में भाजपा की हार को सत्तारुढ भाजपा सरकार की नाकामी बताते हुए विरोधी खेमा एक्टिव होना शुरु हुआ, जो आज तक सक्रिय है। इनका विरोधी खेमा के आरोप हैं कि इस राज में भाजपा कार्यकर्ता तो दूर विधायकों की सुनवाई नहीं हो रही है। प्रदेश में अफसरशाही हावी है। भ्रष्टाचार-घोटालों से सरकार बदनाम है। जनता व कार्यकर्ता दुखी है। हालांकि इन तमाम तरह की शिकायतें भाजपा आलाकमान तक पहुंचाई भी गई। विरोधी खेमे के नेता मिलकर भी इस संबंध में अवगत करा चुके हैं, लेकिन सवा तीन साल में विरोधी खेमे को सीएम वसुंधरा राजे को हटाने संंबंधी कोई कामयाबी नहीं मिल पाई। यूपी चुनाव में प्रचण्ड बहुमत से भाजपा की जीत के बाद राजस्थान में फिर से विरोधी खेमे की मुहिम तेज हो गई। हालांकि राजस्थान के प्रभारी वी.सतीश व दूसरे नेता वसुंधरा राजे को सीएम पद से हटाने संबंधी अफवाहों को खारिज कर चुके हैं। विरोधी खेमे की सक्रियता को देखते हुए धौलपुर सीट को सीएम राजे ने प्रतिष्ठा का सवाल मानते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं को एकुजटता के साथ लगाया और खुद भी वहां मौजूद रहकर चुनावी प्रबंधन संभाला। रिकॉर्ड मतों से कांग्रेस के दिग्गज नेता को हराकर भाजपा ने यह सीट जीती है। इससे वसुंधरा राजे का कद पहले से अधिक बढ़ेगा, बल्कि जिस सक्रियता से विरोधी खेमा लगा हुआ था, उनकी मुहिम को ब्रेक लगेंगे। इस जीत से केन्द्रीय नेतृत्व को को संदेश दिया जाएगा है कि पार्टी वसुंधरा राजे के नेतृत्व में एकजुट है और आगामी विधानसभा चुनाव भी उन्हीें के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। कुल मिलाकर धौलपुर सीट की जीत भाजपा के साथ मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए बड़ा संबल लेकर आई है। इससे विरोधी खेमा ना केवल हताश होगा, बल्कि केन्द्रीय नेतृत्व भी शायद अब इन्हें तवज्जों कम ही देगा।
– पायलट विरोधी खेमे की बढ़ेगी सक्रियता
धौलपुर सीट से बनवारी लाल शर्मा की करारी शिकस्त से कांग्रेस को खासा धक्का लगा है। साथ ही पीसीसी चीफ सचिन पायलट पर भी इस हार के चलते उनका विरोधी खेमा सियासी हमले कर सकता है। विरोधी खेमा इस हार का ठीकरा उनके सिर पर डालते हुए उनह्ें हटाने की मुहिम तेज कर सकता है। विरोधी खेमा इस हार को लेकर केन्द्रीय नेतृत्व से मिलने की फिराक में है। हालांकि राजस्थान समेत अन्य राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति ठीक नहीं रही है। सिर्फ कर्नाटक को छोड़कर सभी जगह पर पार्टी को हार का सामना देखना पड़ा है। इससे पहले भी पार्टी कई राज्यों में हार चुकी है। कांग्रेस वैसे भी अब बुरे दौर से गुजर रही है। इस सीट को जीतने के लिए पीसीसी चीफ सचिन पायलट ने भरपूर प्रयास किए। खुद कई दिनों तक क्षेत्र में ना केवल चुनाव प्रबंधन संभाला, बल्कि चुनावी सभाएं करके कार्यकर्ताओं व नेताओं में जोश भरने का काम किया। कांग्रेस के बड़े नेताओं को भी क्षेत्र में उतारा। लेकिन पार्टी यह सीट जीत नहीं पाई। विरोधी खेमा पार्टी की बड़े अंतर से हार को लेकर मुद्दा बना सकता है। विरोधी खेमा पार्टी नेतृत्व को यह संदेश देने की कोशिश करेगा कि पायलट के नेतृत्व में कांग्रेस एकजुट नहीं है। आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को सत्ता में लाने के लिए राजस्थान में अनुभवी और सर्वमान्य नेता को ही पार्टी की कमान सौंपनी होगी।

कोई जवाब दें