• राकेश कुमार शर्मा
    जयपुर। केरल में राजनीतिक विचारधारा की जंग चरम पर है। वहां अतिवादी वामपंथी तो राजनीतिक तौर पर मजबूत है, वहीं मुस्लिम लीग और कांग्रेस व उससे समर्थित दल भी मजबूती के साथ जमे हुए हैं। इन सबके के बीच में भाजपा और आरएसएस भी अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने और पार्टी को मजबूती देने के लिए वहां लम्बे समय से संघर्ष कर रही है। भाजपा व आरएसएस को रोकने के लिए जहां सभी दल विरोधी होने के बावजूद एकजुट दिखते हैं, वहीं इन्हें रोकने के लिए भाजपा व आरएसएस कार्यकर्ताओं पर हमले से भी गुरेज नहीं करते हैं। हाल ही भाजपा के एक युवा कार्यकर्ता रेमिथ को सरेआम धारदार हथियारों से काट डाला गया। मौके पर ही उसकी मौत हो गई। भाजपा ने वामपंथी दलों पर हत्या का आरोप लगाया है। वहीं वामदलों ने इसे नकारते हुए कुछ दिनों पहले हुई एक माकपा कार्यकर्ता की हत्या के पीछे भाजपा का हाथ होना बताया है। बताया जाता है चार दशक के दौरान वहां एक हजार से अधिक राजनीतिक हत्या हो चुकी है। इनमें से करीब चालीस फीसदी हत्याएं भाजपा व आरएसएस के कार्यकर्ताओं की है। शेष में वामपंथी, कांग्रेस, मुस्लिम लीग व दूसरे दलों के कार्यकर्ता है। हाल ही भाजपा कार्यकर्ता की हत्या के बाद केरल में राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है। हत्याकाण्ड के बाद भाजपा ने एक दिन का केरल बंद रखा। जिसमें भाजपा ने जबरदस्त तरीके से विरोध जताया है। केरल सरकार ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है। केरल में भाजपा व आरएसएस कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमलों को लेकर जयपुर प्रवास पर आए केरल के ही आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक और अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख जे.नंदकुमार से जनप्रहरी एक्सप्रेस.कॉम के एडिटर इन चीफ राकेश कुमार शर्मा ने बातचीत की थी। नंदकुमार से हुई बातचीत के अंश……………….
    प्रश्न: केरल में आरएसएस, भाजपा के अलावा दूसरे दलों के कार्यकर्ताओं की हत्याएं और उन पर हमलों के पीछे कौन हैं और इन हमलों के क्या मायने हैं?
    जवाब: केरल की राजनीतिक, सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियां देश के अन्य प्रांतों से काफी अलग है। पूरे देश में यह सोच है कि केरल में ईसाई व मुस्लिम सर्वाधिक है, जबकि हकीकत इससे उलट है। यहां साठ फीसदी आबादी हिन्दु समाज की है। करीब 27 फीसदी मुस्लिम और शेष ईसाई समुदाय से है। राजनीतिक तौर पर मुस्लिम समाज का रुझान मुस्लिम लीग की तरफ है। ईसाई समाज का कांग्रेस व क्षेत्रीय दलों (चर्च से नियंत्रित दलों) के साथ है। जबकि वामदलों का सर्वाधिक प्रभाव हिन्दु समाज के बीच में है। मुस्लिम व ईसाई समाज में इनका प्रभाव काफी कम है। एक समय में हिन्दु समाज व उनके गांवों में वामदलों का इतना प्रभाव था कि दूसरी पार्टी चाहे वह कांग्रेस हो या अन्य कोई दल, वह उनके क्षेत्रों में प्रचार तो दूर घुस तक नहीं सकते थे। अगर कोई दूसरे दल का प्रत्याशी या समर्थक उनके क्षेत्रों में जाकर स पर्क करता था तो उन पर हमले होना आम बात थी। आज भी ऐसी ही कुछ स्थिति है, लेकिन दूसरे दलों के उभार व मजबूती के कारण पहले जैसी तो स्थिति नहीं है, लेकिन आज भी इनका दबदबा कायम है। इसे वे कानूनी व गैर कानूनी तरीके से बनाए हुए रखे हैं। यह जरुर है, जब से केरल में आरएसएस ने कार्य शुरु किया है, तब से वामदलों व उनके जुड़े संगठनों खासकर सीपीएम की सियासी जमीन खिसकने लगी है, बल्कि जनता भी वामदलों के शासनों में हुए भ्रष्टाचार, विकास नहीं होने, धनबल व भुजबल से सत्ता पर काबिज रहने, पूंजीवाद की दुहाई देकर दूसरे दलों व कार्यकर्ताओं पर हमले करके उन्हें प्रताडि़त करने जैसे मुद्दों को भी समझने लगी है। करीब पचास दशक के दौरान कई तरह के अत्याचार और अपनों को खोने का दर्द सहकर आज संघ-भाजपा ने केरल में आज इतनी पकड़ तो बना ली है, कि वह जनता के सामने उनकी गैरकानूनी व जन विरोधी गतिविधियों को उजागर कर सके और उनके खिलाफ मोर्चा भी खोल सके। एक समय था जब संघ-भाजपा को कोई जानता तक नहीं था, लेकिन आज सत्रह फीसदी मतदाताओं तक भाजपा की सीधी पकड़ है। निकाय चुनाव में कई क्षेत्रों में पार्टी प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की है। वामदलों के अधीन क्षेत्रों में संघ-भाजपा का वर्चस्व बढ़ा है।
    यहीं कारण है कि सियासी जमीन खिसकती देखकर वामदल खासकर सीपीएम व दूसरे अतिवादी संगठन हर तरीके से संघ-भाजपा को दबाना चाहते हैं। कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले कर रहे हैं। कार्यालयों पर बम फैंकते हैं। समर्थकों को सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर नुकसान पहुंचाया जाता है। आजादी के बाद से केरल में राजनीतिक झड़पों में हजारों कार्यकर्ताओं की मौत हुई है। चार दशक में 267 स्वयं सेवक और कार्यकर्ता सियासी हमलों में अपनी जान गंवा चुके हैं। हजारों कार्यकर्ताओं को जानलेवा हमले सहन करने पड़े। इनके पीछे एक अतिवादी वाम दल का संगठन का हाथ रहा। अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए यह दूसरे दलों को डराने-धमकाने से परहेज नहीं करते। हाल ही एक आरएसएस स्वयं सेवक को सरेआम काट दिया गया। एक कांग्रेस कार्यकर्ता को भी दिनदहाड़े मारा। मुस्लिम लीग की सभा में बम फैंके गए। यह सब इसलिए करते हैं कि अगर कोई उनके क्षेत्र या वोट बैंक में घुसपैठ करेगा तो उसे इसी तरह से रोकेगा। सरकार में होने के कारण हमलावरों व हमलावर दलों के खिलाफ ठोस कार्रवाई भी नहीं हो पाती है। केरल में 28-29 फीसदी वोट पर सरकार बन जाती है। कांग्रेस और वामदल के बीच वोट प्रतिशत 28 से 30 फीसदी रहता है। जो भी एक-दो फीसदी ज्यादा वोट प्रतिशत हासिल कर लेता है, वह मुस्लिम लीग व दूसरे छोटे क्षेत्रीय दलों के सहयोग से सरकार बना लेता है। यहां हमेशा से ही कांग्रेस की अगुवाई वाली यूडीएफ और वामदलों की एलडीएफ का शासन रहा है। भाजपा-संघ का जनाधार बढऩे से सबसे ज्यादा नुकसान वामदलों को हो रहा है। क्योंकि भाजपा-संघ भी उस हिन्दु समाज में तेजी से अपनी पकड़ बना रही है, जिस पर कभी वामदलों का दबदबा रहा। वामदलों को यह दबदबा अब उखडऩे लगा है। उनका वोट वैंक खिसकने लगा है। इसे बचाने के लिए वे गैर कानूनी कदम उठाने से भी नहीं चूक रहे हैं। चाहे वह विरोधी दलों (भाजपा-संघ के साथ मुस्लिम लीग व कांग्रेस) पर भी हमले करने नहीं चूक रहे हैं।
    प्रश्न: आज केन्द्र में भाजपा सरकार है। फिर ऐसे हमलों पर कार्रवाई क्यों नहीं करवाई जाती और क्यों नहीं ऐसे मामलों को उठाया जाता है?
    जवाब: केन्द्र में भाजपा की सरकार है, लेकिन राज्य में तो कांग्रेस के अगुवाई वाले यूडीएफ की सरकार है। वह भी अंदरखाने वामदलों से मिली हुई है। दोनों ही दल नहीं चाहते हैं कि संघ-भाजपा का केरल में जनाधार बढ़े। इसलिए वह संघ-भाजपा के कार्यकर्ताओं पर होने वाले हमलों की जांच स्थानीय पुलिस से करवाते हैं।
    यह जरुर है कि संघ-भाजपा के कुछ बड़े नेताओं व स्वयं सेवकों की हत्याओं के मामलों की जांच सीबीआई से करवाने के लिए स्थानीय इकाई ने केन्द्र सरकार को ज्ञापन दिया और उनमें जांच भी शुरु हो गई है। केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार से भी रिपोर्ट मांगी है। लेकिन पुलिस और प्रशासन पर वामदलों व कांग्रेस का खासा प्रभाव होने तथा इनके दमनचक्र के चलते हमलों व हत्याओं की जांच सही तरीके से नहीं हो पाती है और हमलावर आरोपी छूटते रहते हैं।
    जेएनयू, रोहित वोमिला, असहिष्णुता जैसे मामलों में तो तथाकथित प्रगतिशील, प्रबुद्ध वर्ग और स्वयंसेवी संस्थाएं खूब हल्ला करती है और इसे राष्ट्रीय मुद्दा बना लिया जाता है। लेकिन केरल में अतिवादी वामपंथी दल के इशारे पर आए दिन आरएसएस-भाजपा के कार्यकर्ताओं की हत्याओं, केरल के दलितों पर अत्याचार और जनता पर दमनचक्र, वामपंथी सरकार के भ्रष्टाचार को लेकर कोई चर्चा तक नहीं कर रहा है। चाहे वह मीडिया हो या तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग।

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