delhi.वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय एक कायोन्‍मुख योजना बना रहा है जो 2025 से पहले 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था बनने की दिशा में भारत की यात्रा को गति देने के लिए विशिष्ट क्षेत्र स्तर पर हस्तक्षेपों को उजागर करेगी। इस प्रकार की केंद्रित योजनाओं का जोर सेवा क्षेत्र के योगदान को बढ़ाकर 3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर, विनिर्माण क्षेत्र के योगदान को बढ़ाकर 1 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर और कृषि क्षेत्र के योगदान को बढ़ाकर 1 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर करने पर होगा।

मंत्रालय ने सेवाओं में 12 चैंपियन क्षेत्रों को बढ़ावा देने के लिए 1 अरब अमेरिकी डॉलर की निधि तैयार की है और यह भविष्य की मांगों को ध्यान में रखते हुए नई औद्योगिक नीति जारी करने पर काम कर रहा है। इसके अलावा वाणिज्य विभाग और औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग दोनों के सभी प्रयास भारत को 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था बनाने के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में हैं।
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वाणिज्य विभाग के उस प्रस्ताव को मंजूरी दी है जिसके तहत चिन्ह्ति 12 चैम्पियन सेवा क्षेत्रों पर ध्‍यान केंद्रित करने, उनके विकास को बढ़ावा देने और उनकी क्षमताओं को भुनाने का सुझाव दिया गया है। इन सेवा क्षेत्रों में सूचना प्रौद्योगिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी समर्थ सेवाएं (आईटी एवं आईटीईएस), पर्यटन एवं आतिथ्य सेवा, चिकित्सा मूल्य यात्रा, परिवहन एवं रसद सेवाएं, लेखा एवं वित्त सेवाएं, ऑडियो विजुअल सेवाएं, कानूनी सेवाएं, संचार सेवाएं, निर्माण एवं संबंधित इंजीनियरिंग सेवाएं, पर्यावरण सेवाएं, वित्तीय सेवाएं और शैक्षणिक सेवाएं शामिल हैं।

यह पहल केंद्रित एवं निगरानी कार्य योजनाओं के कार्यान्वयन के माध्यम से भारत के सेवा क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगी जिससे जीडीपी वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा, अधिक रोजगार सृजन होगा और वैश्विक बाजारों को निर्यात के लिए प्रोत्‍साहन मिलेगा।
भारत के सेवा क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं है। यह पहल केंद्रित एवं निगरानी कार्य योजनाओं के कार्यान्वयन के माध्यम से भारत के सेवा क्षेत्र की स्पर्धा बढ़ाएगी जिससे भारत में अधिक नौकरियां पैदा होंगी, जीडीपी में योगदान बढ़ेगा और वैश्विक बाजारों को सेवाओं का निर्यात बढ़ेगा।
भारत के सकल घरेलू उत्पाद, निर्यात एवं रोजगार सृजन में सेवा क्षेत्र महत्वपूर्ण योगदान करता है, इसलिए चैंपियन सेवा क्षेत्रों की उत्पादकता एवं प्रतिस्पर्धा में वृद्धि भारत से विभिन्न सेवाओं के निर्यात को और बढ़ावा देगी। एम्बेडेड सेवाएं ‘माल’ का भी पर्याप्त हिस्सा हैं। इस प्रकार, प्रतिस्पर्धी सेवा क्षेत्र विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ाएगा।
सेवाओं के वैश्विक निर्यात में भारत के सेवा क्षेत्र की हिस्‍सेदारी 2015 में 3.3% हो गई जो 2014 में 3.1% थी। इस पहल के आधार पर वर्ष 2022 के लिए 4.2% के लक्ष्य की परिकल्‍पना की गई है।
भारत के सकल मूल्‍य योगदान (जीवीए) में सेवाओं की हिस्‍सेदारी 2015-16 में लगभग 53% (निर्माण सेवाओं सहित 61%) रही थी। वर्ष 2022 तक जीवीए में सेवाओं की 60% (निर्माण सेवाओं सहित 67%) हिस्‍सेदारी हासिल करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है।
वाणिज्य मंत्रालय ने 2022 तक भारत के कृषि निर्यात को 60 बिलियन अमरीकी डॉलर तक बढ़ाने के लिए एक केंद्रित योजना के साथ भारत की पहली कृषि निर्यात नीति तैयार की है जिससे कृषि मंत्रालय को 100 अरब अमेरिकी डॉलर के लक्ष्य को हासिल करने और भारतीय किसानों एवं उच्च गुणवत्ता वाले कृषि उत्पादों को वैश्विक मूल्य श्रृंखला के साथ एकीकृत करने में और वैश्विक कृषि में भारत की हिस्‍सेदारी को दोगुना करने में मदद मिल सके।
कृषि निर्यात नीति का दृष्टिकोण उचित नीतिगत उपायों के माध्यम से भारतीय कृषि की निर्यात क्षमता का उपयोग करना, भारत को कृषि में वैश्विक शक्ति बनाना और किसानों की आय बढ़ाना है।

कृषि निर्यात नीति के तत्व:

कृषि निर्यात नीति के तहत दो श्रेणियों – रणनीतिक और परिचालन – में सिफारिशें की गई हैं:

रणनीतिक

नीतिगत उपाय

बुनियादी ढांचा एवं लॉजिस्टिक सहायता

निर्यात को बढ़ावा देने के लिए समग्र दृष्टिकोण

कृषि निर्यात में राज्य सरकारों की बड़ी भागीदारी

परिचालन

क्लस्टर पर ध्‍यान केंद्रित करना

मूल्य वर्धित निर्यात को बढ़ावा देना

‘ब्रांड इंडिया’ का विपणन और प्रचार

उत्पादन और प्रसंस्करण में निजी निवेश आकर्षित करना

मजबूत गुणवत्ता के नियम

अनुसंधान एवं विकास

विविध

व्यापार की बढ़ावा:

वाणिज्य मंत्रालय निर्यात क्षेत्र के लिए ऋण प्रवाह को सुगम बनाने विशेष रूप से छोटे निर्यातकों को धन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए वित्त मंत्रालय के साथ मिलकर काम कर रहा है।

वाणिज्य मंत्री ने 15 रणनीतिक विदेशी स्थानों की पहचान की है जहां व्यापार संवर्धन संगठन (टीपीओ) का निर्माण करने का प्रस्ताव है। इन देशों को निर्यात बढ़ाने के लिए भारत के पास पर्याप्‍त क्षमता मौजूद है लेकिन वर्तमान में उनके साथ व्यापार महज एक अंक में है। जिन स्थानों पर टीपीओ प्रस्तावित हैं वे इस प्रकार हैं: अस्टाना (कजाखस्तान), बीजिंग (चीन) केप टाउन (दक्षिण अफ्रीका), दुबई (संयुक्त अरब अमीरात), फ्रैंकफर्ट (जर्मनी), हो ची मिन्ह सिटी (वियतनाम), जकार्ता (इंडोनेशिया) लीमा (पेरू), लंदन (ब्रिटेन), मेलबर्न (ऑस्ट्रिया), मेक्सिको सिटी (मेक्सिको), मॉस्को (रूस), न्यूयॉर्क (अमेरिका)+.

पाउलो (ब्राजील) और टोक्यो (जापान)।

निर्यात में तेजी:

पिछले 6 वर्षों में भारत के निर्यात में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई है। क्षेत्र के लिए विशिष्ट हस्तक्षेप, केंद्रित निर्यात को बढ़ावा देने की पहल, अत्‍यधिक पारदर्शिता और समस्‍याओं के त्वरित समाधान के कारण वर्ष 2017-18 (अक्टूबर से सितंबर) में पिछले वर्ष के मुकाबले निर्यात में 14.76% की आकर्षक वृद्धि हुई है।

वाणिज्य विभाग भारत की निर्यात टोकरी में क्षेत्रवार और वस्तुओं के अनुसार विविधता लाने के लिए सभी प्रयास कर रहा है। मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) भारत के व्यापार संतुलन को सुधारने के साधन हैं। अमेरिका के साथ द्विपक्षीय वार्ता जारी है और चीन के वाणिज्‍य मंत्रालय (एमओएफसीओएम) के साथ वाणिज्य विभाग के जरिये भारत ने जून, अगस्त और नवंबर 2018 में तीन अंतर-मंत्रालयी प्रतिनिधिमंडल स्‍तरीय बातचीत की है ताकि बाजार तक पहुंचने के मुद्दों को निपटाया जा सके। जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ कस्टम चाइना (जीएसीसी) ने भारत के कुल 24 भारतीय चावल मिलों को चीन को गैर-बासमती चावल के निर्यात के लिए मंजूरी दी है। साथ ही 28.09.2018 और 30.09.2018 को 100 टन सफेद चावल (5% टूटा हुआ) की पहली खेप भेजी गई। अक्टूबर 2018 में चीन को 23 टन चावल का निर्यात किया गया। इसके बाद नवंबर 2018 में 260 टन चावल का निर्यात हुआ। चीन को खाद्य रैपसीड का निर्यात, जिसे 2012 में बंद कर दिया गया था, अब वाणिज्य विभाग और जीएसीसी के निरंतर प्रयासों से खोला गया है। चीन ने खाद्य रैपसीड की आपूर्ति के लिए पांच रैपसीड मिलों को मंजूरी दी। दिसंबर 2018 में खाद्य सोयाबीन मिलों और अनार के बागों और पैक हाउसों का निरीक्षण करने के लिए जीएसीसी टीमों ने भी भारत का दौरा किया। चीन अगले वर्ष के आरंभ में भारत से 50,000 टन कच्चे चीनी का आयात शुरू कर देगा।

मेटल्‍स एंड मिनरल्‍स ट्रेडिंग कॉरपोरेशन (एमएमटीसी):

एमएमटीसी भारत के लिए विदेशी मुद्रा कमाने वाला और व्यापार करने वाला सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है। वर्ष की पहली छमाही के दौरान एमएमटीसी ने 12,511 करोड़ रुपये का परिचालन राजस्व अर्जित किया जबकि पिछले साल की समान अवधि में उसे 9,996 करोड़ रुपये की परिचालन आय हुई थी जो साल दर साल आधार पर 26% की वृद्धि दर्शाती है। इस दौरान कंपनी का शुद्ध लाभ पिछले साल के 29.76 करोड़ रुपये के मुकाबले 40% बढ़कर 41.62 करोड़ रुपये हो गया। वित्त वर्ष 2018-19 की दूसरी छमाही के दौरान कंपनी का प्रदर्शन कहीं अधिक बेहतर होने के आसार हैं।

निर्यात योजना के लिए व्‍यापार बुनियादी ढांचा:

निर्यात योजना के लिए व्यापार बुनियादी ढांचा (टीआईईएस) सीमावर्ती हाटों, स्‍थल सीमा शुल्क केंद्रों, गुणवत्ता परीक्षण एवं प्रमाणन प्रयोगशालाओं, शीतगृह श्रृंखलाओं, व्यापार संवर्धन केंद्रों, सूखे बंदरगाहों, निर्यात गोदाम और पैकेजिंग, एसईजेड एवं बंदरगाहों, हवाई अड्डा कार्गो टर्मिनस जैसे भारी निर्यात लिंकेज के साथ बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की स्थापना एवं उन्नयन के लिए सहायता प्रदान करती है। निर्यात संवर्धन परिषद, कमोडिटी बोर्ड, एसईजेड प्राधिकरण और भारत सरकार की एग्जिम नीति के तहत मान्यता प्राप्त शीर्ष व्यापार निकायों सहित केंद्रीय एवं राज्य एजेंसियां इस योजना के तहत वित्तीय सहायता के लिए पात्र हैं।

निर्यातकों के लिए कारोबारी सुगमता- डीजीएफटी द्वारा उठाया गया कदम:

विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने आईटी प्‍लेटफॉर्म को मजबूत करने और निर्यातकों के लिए कारोबारी सुगमता सुनिश्चित करने के लिए कई उपाय किए हैं:

क. डीजीएफटी ने इस साल मौजूदा आईटी हार्डवेयर को अपग्रेड कर दिया है।

ख. सितंबर 2017 में डीजीएफटी वेबसाइट पर एक ऑनलाइन शिकायत निवारण सेवा शुरू की गई: कॉन्‍टैक्‍ट @ डीजीएफटी। यह निर्यातकों और आयातकों के सभी विदेशी व्यापार से जुड़े मुद्दों के लिए एकल संपर्क बिंदु है। पिछले साल इस प्‍लेटफॉर्म पर 60,000 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं और 97% शिकायतों का निवारण किया गया।

ग. डीजीएफटी की ईडीआई प्रणाली अपनी अधिकतर योजनाओं और मंजूरियों के लिए निर्यातकों- आयातकों के लिए ऑनलाइन आवेदन की सुविधा प्रदान करती है। इन योजनाओं में आईईसी, अग्रिम मंजूरी योजना, वार्षिक अग्रिम मंजूरी योजना, डीएफआईए, ईपीसीजी योजना, वार्षिक ईपीसीजी योजना, एमईआईएस, एसईआईएस, एफपीएस, एफएमएस, एमएलएफपीएस, वीकेजीयूवाई, एसएफआईएस, एसआईआईएस, वृद्धिशील निर्यात प्रोत्साहन योजना, प्रतिबंधित वस्तुओं के आयात एवं निर्यात के लिए मंजूरी आदि शामिल हैं। अन्य एजेंसियों (सीमा शुल्क और आरबीआई) के साथ मुलाकात भी ईडीआई प्रणाली के माध्यम से होती है।

घ. सभी शिपिंग बिलों के लिए सीमा शुल्‍क विभाग से प्राप्‍त शिपिंग बिल डेटा का ऑनलाइन दृश्‍य 1.4.2016 से क्षेत्रीय कार्यालयों को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से जारी किया जा रहा है। अब निर्यातकों को ईओडीसी को भुनाने के लिए शिपिंग बिल की हार्ड कॉपी जमा कराने की आवश्यकता नहीं होगी। डीजीएफटी क्षेत्रीय कार्यालय अन्य तमाम प्रयोजनों के लिए भी सीमा शुल्क विभाग की ओर से प्रेषित इलेक्ट्रॉनिक एसबी डेटा का उपयोग कर सकते हैं।

ड. निर्यातक ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म पर आयातक निर्यातक कोड (आईईसी) स्वयं सृजित कर सकते हैं।

च. एमईआईएस लाभ के ऑनलाइन स्‍वत: स्वीकृति को एमईआईएस के तहत 97% उत्पाद लाइनों के लिए सितंबर 2018 से लागू किया गया है। अब एमईआईएस के एप्लिकेशन सिस्टम द्वारा अनुमोदित हैं और अनुमोदन के 3 दिनों के भीतर स्क्रिप्स जारी किए जाते हैं।

छ. कॉल सेंटर को मजबूत किया गया है और अब हेल्प डेस्क पर प्राप्त सभी टेलीफोन कॉल की बारीकी से निगरानी की जाती है। एक आईवीआरएस प्रणाली भी तैनात की गई है।

कारोबारी सुगमता रैंकिंग में भारत की स्थिति में सुधार:

भारत ने इस साल विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता रैंकिंग में 23 पायदान चढ़कर 77वें पायदान पर पहुंच गया। पिछले दो वर्षों में भारत की रैंकिंग में 53 पायदान का सुधार हुआ है और यह 2011 के बाद से 2 साल में सबसे ज्यादा सुधार दर्ज करने वाला देश बन गया है। भारत अब दक्षिण एशियाई देशों के बीच कारोबारी सुगमता रिपोर्ट में पहले स्थान पर है जो 2014 में छठे पायदान पर रहा था।

भारत ने 10 संकेतकों में से 6 में अपने रैंक में सुधार दर्ज किया है और वह 10 संकेतकों में से 7 में सर्वोत्तम अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं (सीमांत अंक से दूरी) के करीब पहुंच चुका है। निर्माण परमिट और सीमाओं के व्यापार से संबंधित संकेतकों में सबसे नाटकीय सुधार दर्ज किए गए हैं। निर्माण परमिट के अनुदान में भारत की रैंक 2017 में 181 से बढ़कर 2018 में 52 हो गई जो एक वर्ष में 129 पायदान का सुधार दर्शाता है। सीमापार व्यापार में भारत 66 पायदान सुधार के साथ 80वें पायदान पर पहुंच गया जबकि 2017 में वह 146वें पायदान पर था।

-राज्‍यों की रैंकिंग:
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) विश्व बैंक के सहयोग से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) के लिए बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान (बीआरपी) के तहत वार्षिक सुधार कार्यक्रम आयोजित करता है ताकि केंद्र सरकार की विभिन्‍न नियामकीय गतिविधियों एवं सेवाओं को कुशल, प्रभावी एवं पारदर्शी तरीके से बेहतर बनाया जा सके। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने श्रम, पर्यावरण मंजूरी, निर्माण परमिट, अनुबंध प्रवर्तन, संपत्ति पंजीकरण एवं निरीक्षण जैसे क्षेत्रों में अपने नियमों और व्‍यवस्‍थाओं को सुगम बनाने के लिए सुधार किए हैं। राज्यों ने भी पंजीकरण एवं मंजूरियों के लिए समय-सारिणी लागू करने के लिए लोक सेवा डिलिवरी गारंटी कानून को अधिनियमित किए हैं।

कारोबारी सुगमता रैंकिंग में सुधार भारत सरकार द्वारा किए गए परिवर्तनकारी उपायों के कारण संभव हुआ है जिसमें विधायी एवं नियामक दोनों तरह के सुधार शामिल हैं। स्‍टार्टअप और एमएसएमई के लिए कम कर दरों का समर्थन करने के लिए 600 दिनों के बजाय 140 दिनों में त्वरित पर्यावरणीय मंजूरी व्‍यवस्‍था लागू की गई है। इसके अलावा जीएसटी लागू होने के बाद अंतरराज्‍यीय चेक पोस्‍ट को खत्म कर दिया गया है और बेहतर इनपुट कर क्रेडिट एवं इलेक्ट्रॉनिक जीएसटी नेटवर्क तैयार किया गया है। साथ ही, देश में स्‍टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए अनुबंधों पर तेजी से अमल करने और सुरक्षा मंजूरियों में तेजी लाने के लिए फास्‍ट ट्रैक वाणिज्यिक अदालत स्‍थापित किए गए हैं।

ब्रिक्स देशों के बीच भारत की रैंकिंग 2010 में 5वीं थी जो सुधरकर 2018 में तीसरी हो गई। इस बेहतर रैंकिंग को सुनिश्चित करने के लिए किए गए उपायों में निर्माण परमिट जारी करना शामिल है जहां भारत का स्‍थान 52वां है, बिजली कनेक्शन प्राप्त करने के लिहाज से भारत 24वें पायदान पर मौजूद है और सीमा पार व्‍यापार के लिहाज से भारत अब 84वें स्‍थान पर मौजूद पर है। करों के भुगतान के लिहाज से भारत की रैंकिंग 121वीं है जबकि दिवालियापन के समाधान के मामले में भारत 108वें पायदान पर मौजूद है।

– स्टार्ट-अप के लिए कारोबारी सुगमता सुनिश्चित करने के लिए 21 नियामकीय बदलाव किए गए हैं।

संसाधन उपयोगिता को युक्तिसंगत बनाने और विनिर्माण क्षेत्र की दक्षता में वृद्धि के लिए डीआईपीपी ने मई 2017 में देश भर में औद्योगिक क्षेत्रों एवं समूहों के लिए जीआईएस-समर्थ डेटाबेस औद्योगिक सूचना प्रणाली (आईआईएस) को लॉन्च किया। यह पोर्टल एक ही जगह सभी समाधान के तौर पर कार्य करता है। इससे शुल्‍क से लेकर कच्चे माल – कृषि, बागवानी, खनिज, प्राकृतिक संसाधन, प्रमुख लॉजिस्टिक नोड्स से दूरी, इलाके की परतें और शहरी बुनियादी ढांचा आदि की उपलब्धता सहित सभी औद्योगिक सूचनाओं की मुफ्त और आसान पहुंच सुनिश्चित हुई है।

आईपीआरएस को देश भर के सभी पार्कों को कवर करने वाले वार्षिक कार्यक्रम बनाने का प्रस्ताव है। इसके कवरेज को विस्‍तृत किया जाएगा ताकि गहन गुणात्मक मूल्यांकन प्रतिपुष्टि और अद्यतन तकनीकी हस्तक्षेप लाया जा सके और इसे एक ऐसे उपकरण के रूप में विकसित किया जाएगा जो नीति निर्माताओं और निवेशकों दोनों द्वारा मांग संचालित और आवश्यकता आधारित हस्तक्षेप के लिए प्रभावी तौर पर मदद करे।

-जिला स्तर विकास- एक समय में एक जिले की प्रगति:

वाणिज्य मंत्रालय के औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग ने जिला स्तर पर सुधार के लिए एक योजना तैयार की है। इसे जिलों में लागू करने के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों के साथ साझा किया गया है। राज्यों और संघ शासित प्रदेशों से अनुरोध किया गया है कि वे इस योजना के कार्यान्वयन में उपलब्धियों के आधार पर जिलों का मूल्यांकन करें।

नीचे से ऊपर के दृष्टिकोण पर ध्यान केंद्रित करते हुए मंत्रालय ने जिला स्तरीय प्रशासन के क्षमता निर्माण के लिए पांच राज्यों में छह जिलों की पहचान की है। जबकि नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) को हिमाचल प्रदेश में सोलन, महाराष्‍ट्र में रत्नागिरी एवं सिंधुदुर्ग में जिला प्रशासन के साथ मिलकर काम करने का निर्देश दिया गया है। आईआईएम लखनऊ उत्तर प्रदेश के वाराणसी, बिहार के मुजफ्फरपुर और आंध्र प्रदेश के विशाखापत्‍तनम में जिला प्रशासन के साथ मिलकर काम कर रहा है। इस कार्योन्‍मुख योजना का लक्ष्य जिला स्तर पर ईओडीबी को बेहतर करने पर ध्यान देने के साथ-साथ जिला स्तर पर उत्पादन में 3% की वृद्धि करना है। इससे भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि को जबरदस्‍त रफ्तार मिलेगी।

वृद्धि के नए प्रक्षेपकों में एफआईडी:

वित्‍त वर्ष 2019 की पहली तिमाही में एफडीआई प्रवाह में वित्‍त वर्ष 2018 की पहली तिमाही के मुकाबले 23% की वृद्धि देखी गई। वित्‍त वर्ष 2019 की पहली तिमाही में एफडीआई प्रवाह 12.7 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। भारत ने पहली बार वित्त वर्ष 2017-18 में 61.96 अरब अमेरिकी डॉलर एफडीआई हा‍सिल की जो अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा है। वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान वाहन एवं वाहनों के कलपुर्जा क्षेत्र में एफडीआई इक्विटी प्रवाह में वित्त वर्ष 2016-17 की तुलना में 13% की वृद्धि हुई। वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान कपड़ा क्षेत्र में एफडीआई इक्विटी प्रवाह में वित्त वर्ष 2016-17 के मुकाबले 18% की वृद्धि दर्ज की गई।

मेक इन इंडिया

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 सितंबर 2014 को भारत को एक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए लॉन्च किया था और इससे भारत एक तेजी से वृद्धि करने वाली अर्थव्‍यवस्‍था के तौर पर उभरा है।

भारत ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स (2015-16) (स्रोत: विश्व बौद्धिक संपदा संगठन) में 15 पायदान उछल गया और लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स (2015-16) (स्रोत: विश्व बैंक) पर 19 स्थान आगे बढ़ा है।

वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता सूचकांक (2014-16) में भारत ने 32 पायदान (स्रोत: विश्व आर्थिक मंच) उछाल के साथ बेहतर स्थित तक पहुंच गया।

वाणिज्य मंत्रालय यह सुनिश्चित करने के लिए पूरा प्रयास कर रहा है कि सार्वजनिक खरीद में मेक इन इंडिया को प्राथमिकता दी गई है:

छूट उस मामले में दी जाती है जहां खरीद का अनुमानित मूल्य 5 लाख रुपये से कम है।
न्यूनतम स्थानीय सामग्री आमतौर पर 50% होगी। नोडल मंत्रालय किसी भी विशेष वस्तु के संबंध में उच्च या निम्न प्रतिशत निर्धारित कर सकता है और स्थानीय सामग्री की गणना के तरीके को भी निर्धारित कर सकता है।
खरीद वरीयता का मार्जिन 20% होगा।
डीआईपीपी के सचिव की अध्‍यक्षता में औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग की एक स्थायी समिति 2017 के उस आदेश के कार्यान्वयन की निगरानी करती है जो मेक इन इंडिया उत्पादों को प्राथमिकता देती है।

अब तक 14 नोडल मंत्रालयों और विभागों ने विभिन्न उत्पाद श्रेणियों के लिए न्यूनतम स्थानीय सामग्री के लिए अधिसूचनाएं जारी की हैं। राज्‍य सरकारों से अनुरोध है कि वे अपने राज्यों में सार्वजनिक खरीद आदेश लागू करें। आदेश के कार्यान्वयन पर जोरदार निगरानी की जा रही है। डीआईपीपी में एक सार्वजनिक खरीद प्रकोष्‍ठ बनाया गया है। स्थायी समिति की नियमित बैठकें उद्योग-विशिष्ट बैठकों को उद्योग से प्रतिक्रिया देने और प्रतिक्रिया लेने के अलावा आयोजित की जा रही हैं।

पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्‍स से चमक में निरंतर विस्तार संकेत:

पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्‍स (पीएमआई) विनिर्माण और सेवाओं दोनों क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधि का संकेतक है। अक्टूबर 2018 में पीएमआई 53.1 हो गया जो अक्टूबर 2017 में 50.3 रहा था। अक्टूबर 2018 पीएमआई लगातार 15वें महीने 50 से अधिक रहा जो विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि को दर्शाता है।

स्टार्टअप में भारी वृद्धि:

स्टार्ट-अप इंडिया भारत सरकार की एक प्रमुख पहल है जिसका उद्देश्य एक मजबूत माहौल तैयार करना है जो स्टार्टअप व्यवसायों के विकास के लिए अनुकूल हो, सतत आर्थिक विकास को रफ्तार देने में समर्थ हो और बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए अनुकूल हो। इस पहल के माध्यम से सरकार की नजर नवाचार एवं डिजाइन के जरिये विकास के लिए स्टार्टअप को सशक्त बनाना है।

डीआईपीपी मान्यता प्राप्त स्टार्टअप की संख्या 18 नवंबर में 14,545 तक पहुंच गई, जबकि अक्टूबर 2017 में यह आंकड़ा महज 4,610 था। इससे कुल 1,30,424 लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हुए।

भारत को रोजगार तलाशने वालों के देश से रोजगार सृजन करने वालों के देश में तब्‍दील करने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा 16 जनवरी, 2016 को शुरू की गई पहल के बाद कई कार्यक्रम शुरू किए गए हैं।

19-सूत्री स्टार्ट-अप इंडिया कार्य योजना के तहत कई इनक्‍यूबेशन सेंटर, आसान पेटेंट फाइलिंग, कर छूट, कारोबार स्‍थापित करने में सुगमता, 10,000 करोड़ रुपये की एक निधि और तेजी से निकास तंत्र की परिकल्‍पना की गई है।

स्टार्ट-अप इंडिया एक्शन प्लान की कुछ उपलब्धियां इस प्रकार हैं (i) स्व-प्रमाणीकरण के आधार पर अनुपालन व्यवस्था के लिए सरलीकरण एवं रखरखाव, मोबाइल ऐप एवं पोर्टल से बाहर निकलना, स्टार्ट-अप इंडिया हब, कानूनी सहायता एवं कम लागत पर फास्‍ट ट्रैक पेटेंट, स्टार्ट-अप के लिए सार्वजनिक खरीद के आसान मानदंड और स्टार्ट-अप के लिए तेजी से बाहर निकलने की सुविधा, (ii) 10,000 करोड़ रुपये की एक निधि के साथ ऋण के लिए फंड के माध्यम से वित्‍तीय सहायता प्रदान करना।, पूंजीगत लाभ पर कर छूट, 3 साल के लिए स्टार्ट-अप को कर छूट, प्रमुख कर को हटाना, (iii) अटल इनोवेशन मिशन को शुरू करने के माध्यम से उद्योग-अकादमिक भागीदारी और इनक्‍यूबेशन को बढ़ावा देना, इनक्यूबेटर सेटअप के लिए निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता का उपयोग करना, 11 प्रौद्योगिकी बिजनेस इनक्यूबेटर का निर्माण, आईआईटी मद्रास के अनुसंधान पार्क की तर्ज पर 7 नए शोध पार्कों की स्थापना, जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में स्टार्ट-अप को बढ़ावा देना और (iv) छात्रों के लिए नवाचार केंद्रित कार्यक्रम शुरू करना।

वाणिज्य विभाग (डीओसी) द्वारा एमएसएमई के लिए समर्थन एवं आउटरीच अभियान:

वाणिज्य मंत्रालय के प्रयासों के कारण एमएसएमई के लिए ब्याज अनुदान 2% बढ़ाया गया था। साथ ही 2 नवंबर 2018 को 80 जिलों में जीईएम पर एक प्रदर्शनी और निर्यात संवर्धन योजनाएं डीओसी द्वारा स्थापित की गई जिसमें डीओसी द्वारा डीजीएफटी और जीईएम से नियुक्त नोडल अधिकारी शामिल हुए।

वाणिज्य विभाग ने एमएसएमई के लिए निम्नलिखित प्रदेय की पहचान की है: एमएसएमई को बाजार तक आसान पहुंच के लिए उसे जीएसएम प्लेटफॉर्म पर लाने और जीएसएम के माध्यम से एमएसएमई से खरीद, एमएसएमई उत्पादों के लिए भारतीय गुणवत्ता नियंत्रण द्वारा गुणवत्ता प्रमाणन और क्षेत्रीय हस्तक्षेप के लिए जिलों की पहचान ताकि एमएसएमई या कोट्टायम में रबड़, कटक एवं हैदराबाद में रत्न व आभूषण और पश्चिम सिक्किम में बड़े इलायची बागानों को प्रोत्साहित किया जा सके।

डीजीएफटी की निर्यात प्रोत्‍साहन योजनाओं के एमईआईएस, एए, ईपीसीजी, डीएफआईए और ब्याज समतुल्‍य जैसे लाभ का विस्‍तार एमएसएमई तक किया जाएगा। नए निर्यातकों को प्रशिक्षित और निर्देशित किया जाएगा कि कैसे निर्यात किया जाए और आईओईसी पंजीकरण और एफटीए मार्ग के तहत निर्यात अवसरों पर एमएसएमई के लिए कार्यशाल आयोजित किए जाएंगे। साथ ही एफआईईओ द्वारा प्रबंधित इंडिया ट्रेड पोर्टल जैसे तमाम पोर्टल के जरिये एफटीए मार्ग की जानकारी दी जाएगी।

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