जयपुर। दिवाली के बाद गोवर्धन पूजा होती है। ठाकुरजी को अन्नकूट का भोग लगता है। साथ ही गोवर्धन की पूजा अर्चना होती है। कई मंदिरों में तो छप्पन भोग की झांकी और प्रसादी होती है। हर छोटे-बड़े मंदिर और घरों में भी अन्नकूट प्रसादी बनती है। अन्नकूट का अपना महत्व और इतिहास है। मथुरावासी भगवान इन्द्र की पूजा करते थे। अच्छी बारिश की कामना से होने वाली फसलों के चलते इन्द्रदेव की पूजा अर्चना होती थी। भगवान श्रीकृष्ण ने यह देखा तो वे अपनी मां से सवाल करने लगे कि इन्द्र देव की पूजा क्यों करते हैं और गोवर्धन की क्यों नहीं? मां ने कहा कि इन्द्र देव बारिश करते हैं, जिससे अच्छी फसल होती है और हमारी गायों को चारा मिलता है। इस पर भगवान कृष्ण ने कहा कि हमारी गायें तो गोवर्धन पर्वत पर हरा चारा चरती है। फिर क्यों इन्द्रदेव की पूजा करें। गोवर्धन की क्यों नहीं। कृष्ण की बात सुन सबने गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी शुरु कर दी। यह देख इन्द्रदेव नाराज हो गए और भारी बारिश कर दी। गांव में पानी देख भगवान ने अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और उसके नीचे सभी लोगों व पशु-पक्षियों को बैठाकर रक्षा की। जब इन्द्रदेव को पता चला कि कृष्ण भगवान विष्णु के अवतार हैं तो उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। फिर इन्द्रदेव के कहने पर कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को नीचे उतारा। भगवान ने कहा कि वे हर साल गोवर्धन की पूजा अर्चना करके अन्नकूट प्रसादी पर्व मनाए। तभी से यह पर्व मनाया जाता है। घरों और मंदिरों में अन्नकूट प्रसादी होती है। छप्पन भोग की झांकी सजती है।

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